मथुरा

Mathura Holi 2026: ब्रज में रहेगी होली की धूम, चलेंगी 170 स्पेशल बसें, जानें लठ्ठमार से लेकर विधवा होली तक का पूरा शेड्यूल

Mathura Holi 2026: मथुरा में मनाई जाने वाली विश्वप्रसिद्ध होली के लिए उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग 170 विशेष बसें चलाएगा, जो मथुरा, वृंदावन और कोसी से बरसाना को जोड़ेंगी। जानिए हर प्रकार की होली का क्या रहेगा शेड्यूल...

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Feb 20, 2026
प्रतीकात्मक तस्वीर - एआइ

Mathura Holi 2026: ब्रज की धरती पर रंगोत्सव 2026 की तैयारियां अपने चरम पर हैं। साल 2026 के रंगोत्सव में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की राह आसान करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार और परिवहन विभाग ने कमर कस ली है। विश्व प्रसिद्ध लठ्ठमार होली से लेकर सामाजिक बदलाव की प्रतीक विधवा होली एक बार फिर ब्रज को विभिन्न रंगों के त्योहार में रंगने जा रहे हैं। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए 170 विशेष बसों का बेड़ा तैयार किया गया है। इन बसों से श्रद्धालुओं को 'राधे-राधे' के उद्घोष के साथ कान्हा की नगरी के दर्शन कराए जाएंगे।

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परिवहन विभाग ने की तैयारी

मथुरा परिवहन निगम के एआरएम मदन मोहन शर्मा ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए 170 विशेष बसें संचालित की जाएंगी। इनमें प्रदूषण मुक्त ई-बसें भी शामिल होंगी। इनमें से 125 बसें मुख्य रूप से मथुरा-बरसाना मार्ग पर चलेंगी। इसके अलावा कोसी, छाता और वृंदावन से भी सीधी बस सेवा उपलब्ध रहेगी। सभी चालकों को निर्देश दिए गए हैं कि यात्रा के दौरान ब्रज की सांस्कृतिक छटा और समय-पालन का विशेष ध्यान रखा जाए।

बरसाना में लड्डू और लठ्ठमार होली

ब्रज होली का मुख्य आकर्षण 25 फरवरी को बरसाना के श्रीजी मंदिर में 'लड्डू होली' के साथ शुरू होगा, जहां भक्तों पर लड्डुओं की वर्षा होगी। इसके अगले दिन यानी 26 फरवरी को विश्व विख्यात 'लठ्ठमार होली' खेली जाएगी। इसमें बरसाना की गोपियां नंदगांव के हुरियारों पर प्रेम भरी लाठियां बरसाएंगी और पुरुष ढाल से अपना बचाव करेंगे।

नंदगांव की लठ्ठमार होली

बरसाना के बाद, 27 फरवरी को रंगोत्सव का केंद्र नंदगांव बनेगा। यहां की लठ्ठमार होली का अपना अलग ही उत्साह होता है। गलियों में उड़ता गुलाल और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच कान्हा के गांव में भक्ति और रंगों का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा।

गोकुल की 'छड़ीमार होली'

ब्रज की परंपराओं में गोकुल की 'छड़ीमार होली' बेहद खास है। यहां लठ्ठ की जगह बांस की पतली छड़ियों का प्रयोग होता है। यह परंपरा बालकृष्ण के बचपन से जुड़ी है, जहां कान्हा के तंग करने पर गोपियां उनके पीछे छड़ी लेकर दौड़ती थीं। भक्त आज भी छड़ी की मार को अपना सौभाग्य मानते हैं, जो प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।

'विधवा होली'- सामाजिक बदलाव का रंग

वृंदावन के गोपीनाथ मंदिर में होने वाली 'विधवा होली' एक क्रांतिकारी पहल है। यहां वर्षों से समाज द्वारा ठुकराई गई हजारों विधवा महिलाएं अपने सफेद वस्त्रों के त्याग कर अबीर, गुलाल और फूलों से होली खेलती हैं। यह आयोजन इन महिलाओं के जीवन में खुशियां, आत्मविश्वास और समानता लाने का संदेश देता है, जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं।

फूलों वाली होली

होली के इस सफर का एक पड़ाव 1 मार्च को 'फूलों वाली होली' के रूप में आएगा। जो लोग भीड़ और पक्के रंगों से बचना चाहते हैं, उनके लिए यह सबसे सुंदर अनुभव होता है। मंदिरों में फूलों की बारिश के बीच भक्त और भगवान के बीच का फासला मिट जाता है और पूरा माहौल सुगंधित हो उठता है।

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Updated on:
20 Feb 2026 03:16 pm
Published on:
20 Feb 2026 03:15 pm
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