मथुरा

‘वह मेरा एकमात्र सहारा है…प्लीज मेरी मां को बचा लीजिए’, वृंदावन नाव हादसे में बचे बेटे ने मां के लिए लगाई गुहार

Vrindavan Boat Tragedy : वृंदावन के केशी घाट पर हुए नाव हादसे में बचे श्वेत जैन अब अपनी मां की जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिता को खो चुके श्वेत के लिए मां ही एकमात्र सहारा हैं। आर्थिक तंगी और PGI की कथित लापरवाही के बीच, एक बेटे ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है।
2 min read
• •
Updated: 14 Apr 2026, 9:30 PM IST
Feature image
मां को बचाने के लिए बेटे ने लगाई मदद की गुहार, PC- X

मथुरा : 'मैं पहले ही पिता को खो चुका हूं। अब अगर मां भी चली गईं तो मेरा क्या होगा? वह मेरी जिंदगी का एकमात्र सहारा हैं।' ये दर्द भरे शब्द हैं 'श्वेत जैन' के…उस युवक के, जिसने चार दिन पहले यमुना नदी में डूबते-डूबते बचकर भी अपनी मां को मौत के मुंह में जाते देख लिया।

10 अप्रैल को वृंदावन के केशी घाट पर यमुना नदी में तीर्थयात्रियों से भरी नाव पलट गई। ‘राधे-राधे’ के भजन गाते-गाते श्रद्धालु अचानक चीखों और पानी की चपेट में आ गए। इस हादसे में अब तक 10 से 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक व्यक्ति अभी भी लापता है। ज्यादातर मृतक और घायल पंजाब के लुधियाना जिले के जगरांव इलाके के रहने वाले हैं।

मां-बेटे की जिंदगी-मौत की लड़ाई

श्वेत जैन (32 वर्ष) और उनकी मां रेखा जैन (55 वर्ष) भी उसी दुर्भाग्यपूर्ण नाव पर सवार थे। दोनों लुधियाना के शास्त्री नगर से ‘बांके बिहारी क्लब’ के साथ वृंदावन दर्शन करने गए थे।

नाव पलटते ही श्वेत ने अपनी मां को पानी में डूबते देखा। खुद पसलियों में गंभीर चोटें लगने के बावजूद उन्होंने मां को बचाने की कोशिश की। दोनों को बचाया गया, लेकिन रेखा जैन की हालत बेहद गंभीर हो गई। उनके फेफड़ों में पानी भर गया और सांस लेना मुश्किल हो गया।

वृंदावन के राम मिशन अस्पताल में भर्ती रेखा की हालत सोमवार को और बिगड़ गई। उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया गया, लेकिन परिवार का आरोप है कि वहां लापरवाही बरती गई। श्वेत बताते हैं कि 'मां आधे घंटे तक स्ट्रेचर पर पड़ी रहीं। किसी ने उनकी सुध नहीं ली। वार्ड पहले से ही सौ से ज्यादा मरीजों से भरा हुआ था। उनका ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा था, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। डॉक्टरों ने कहा कि तुरंत वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं है।'

आखिरकार परिवार ने रात में उन्हें चंडीगढ़ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां अभी रेखा वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं। अस्पताल में पहले ही 39,000 रुपये जमा कराए जा चुके हैं, लेकिन इलाज का खर्च और बढ़ता जा रहा है।

'मैं अकेला कैसे लड़ पाऊंगा?'

श्वेत जैन एक निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। महीने के सिर्फ 15-20 हजार रुपये की तनख्वाह से वे अस्पताल के भारी-भरकम बिल चुकाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। 'मां ही मेरा एकमात्र सहारा हैं। पिता पहले ही गुजर चुके हैं। बहन की शादी हाल ही में हुई है। मैं अकेला कैसे सब संभाल पाऊंगा?' श्वेत की आवाज़ में रोने की सिसकी साफ सुनाई दे रही थी।

उन्होंने पंजाब सरकार से आर्थिक मदद की अपील की है ताकि उनकी मां की जान बचाई जा सके। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर है और अब इस हादसे ने उन्हें पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।

यह कहानी सिर्फ एक हादसे की नहीं है। यह एक बेटे की अपनी मां के लिए जिंदगी-मौत की लड़ाई की कहानी है। जहां भक्ति की यात्रा अचानक मौत की यात्रा बन गई और अब एक परिवार उम्मीद की किरण तलाश रहा है।

जो भी इस परिवार की मदद करना चाहे, वह श्वेत जैन या जगरांव प्रशासन से संपर्क कर सकता है। एक मां की जान बचाना किसी भी मदद से कम नहीं है।

Updated on:
14 Apr 2026, 9:30 PM IST
Published on:
Also Read
View All