
बागपत। बागपत की धरती ने इतिहास उगलना शुरू कर दिया है। हाल ही में बगपत से 'रथ ताबूत और कंकाल मिले थे जिसे महाभारतकालीन बताया जा रहा था। इस बार बागपत के खपराना की धरती ने कुषाणकालीन खजाना उगला है। खुदाई के दौरान कई ऐसी चीजे मिली हैं जिसने लोगों को हैरान कर दिया। खुदाई के दौरान यहां मिट्टी के पात्र में प्राप्त हुई 2000 साल पुरानी ताम्र निर्मित मुद्राएं भी यहां से पाई गयी है। इतिहासकारों के मुताबिक राजा वासुदेव द्वारा विनिमय की ये मुद्राएं जारी की गई थी।
इतिहास उगर रहा है बागपत-
बागपत एक ऐसा जिला है, जो अब किसी पहचान का मोहताज नहीं है। चाहे धर्म नगरी से उसकी पहचान हो या क्राईम का बेताज बादशाहत के रूप में, प्राचीन इतिहास के रूप में हो या फिर पर्यटन के रूप में बागपत ने अपनी पहचान की छाप लोगों के मस्तिष्क में छोड़ी है। इसी साल जून में बागपत की धरती से महाभारतकालिन इतिहास मिले। महाभारत के इतिहास पन्ने पलटने के बाद अब एक खजाने ने यहां के धरती पर एक बार फिर हलचल मचा दी है। अबकी बार बागपत के खपराना गांव के प्राचीन टीले पर प्राचीन सभ्यता के मृदभांड के अलावा 1800-2000 साल पुरानी ताम्र मुद्राएं भी प्राप्त हुई है। इतिहासकार की माने तो सिक्कों, मृदभांड की जांच के बाद यह बात पुष्ट हो रही है कि इस महत्वपूर्ण गांव के 100 बीघा क्षेत्रफल में फैले टीलों पर कुषाण कालीन समेत अन्य मानव सभ्यता होने का प्रमाण दे रही है। प्रारंभिक जांच के दौरान प्राप्त दुर्लभ मुद्राओं, पुरावशेषों के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार की गई है जिसे अमित राय जैन द्वारा एएसआई को भेजा जाएगा। जिसके बाद यहां पर भी दुनिया की नजर टीकना लाजमी है।
खुदाई में क्या-क्या मिला-
बागपत से उत्तर पूर्व की 35 किमी की और बसे बरनावा लाक्षाग्रह से लगभग छह किलोमीटर दूरी पर स्थित खपराना गांव में सैंकडों बीघा से भी अधिक परिक्षेत्र में प्राचीन टीले किसी सभ्यता की मौजूदी का अहसास कराते है। इन टीलों पर प्राचीन सभ्यता के प्रमाण ऊपरी सतह से ही दिखाई देने लगते है। इतिहासकार शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने जब इस टीले का प्रारंभिक सर्वेक्षण किया तो इस दौरान उन्हें यहां से खंडित मृदभांड के रूप में महिलाओं द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कर्णाभूषण, होपस्कॉच, झावा (पैर साफ करने के लिए), बच्चों के खेल-खिलौने, खाद्य सामग्री रखने वाले पात्रों के अलावा बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में ताम्र मुद्राएं भी प्राप्त हुई। ये मुद्राएं मिट्टी की एक छोटी लुटिया में मौजूद थे। इस लुटिया में दो दर्जन से अधिक सिक्के मौजूद थे। मिट्टी से बनी यह लुटिया भी ऊपरी किनारे से थोड़ी खंडित थी। मिट्टी में अधिक समय तक दबे रहने के कारण सिक्के अधिक स्पष्ट नहीं थे। लेकिन सिक्के किसी सभ्यता की और जरूर इशारा कर रहे थे। इन सिक्कों और अन्य प्राप्त पुरावशेषों को लेकर अमित राय जैन शहजाद राय शोध संस्थान बड़ौत आ पहुंचे। यहां पर प्राप्त पुरा सामग्री का गहनता से अध्ययन किया गया। जिसके बाद उन्होंने बताया कि प्राप्त पुरा सामग्री की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर एएसआई व जिलाधिकारी को भेजी जाएगी। साथ ही वे एएसआई से मांग करेंगे कि खपराना गांव में विस्तृत रूप से फैले टीलों पर जल्द से जल्द उत्खनन कार्य कराया जाए ताकि यहां की धरती में दफन प्राचीन सभ्यता को दुनिया के सामने लाया जा सके।
सिक्कों को लेकर क्यों है विश्वास
अमित राय जैन ने बताया कि इन सिक्कों का खपराना गांव के टीलों से मिलना यह सिद्ध करता है कि खपराना गांव के उत्तरी छोर पर अवस्थित यह प्राचीन टीला युगों-युगों से यहां पर विद्यमान है और यह एक ऐसा स्थान है जहां पर हजारों वर्षों से मानव सभ्यता-बस्ती विद्यमान रही और अनेकों युगों की मानव सभ्यता यहां पर फली-फूली। यमुना-हिंडन दोआब के मध्य का इतिहास, संस्कृति, सभ्यता को जानने के लिए इस तरह के पुरास्थलों की खोज करना बेहद आवश्यक है। दरअसल शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन को हाल ही में सूचना मिली जिसके बाद उन्होंने टीले का सर्वेक्षण किया। उनका कहना है कि जो भी सामग्री यहां मिली है। उसकी एक रिपोर्ट वो एएसआई को भेजेंगे और खपराना गॉव के इस टीले पर उत्खनन कराने की भी मांग करेंगे।