
1860 में दिसंबर के महीने में खूब कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। मेरठ के गुजरी बाजार में रहने वाले व्यक्ति रामचंद्र ने ठंड को दूर करने के लिए गुड़ और तिल को कूटकर गोल लडडू बनाया और आसपास के लोगों को बांटा। लोगों ने रामचंद्र के हाथों से बना ये लडडू खाया तो इसकी दुकान खोलने की सलाह दे डाली। वर्ष 1860 में जनवरी माह में मकर संक्राति के दिन रामचंद्र ने अपनी तिल के लडडू की दुकान खोली । जो आज भी गुजरी बाजार में स्थित है।
परिजन संभाल रहे कारोबार
गुजरी बाजार में स्थित रामचंद्र गजक की दुकान पर आज उनके खानदान के लोग बैठते हैं। रामचंद्र के नाम से आज पूरे मेरठ में गजक का कारोबार हो रहा है। सर्दी के मौसम में गरमाहट देने वाली गजक आज 160 साल का सफर पूरा कर चुकी हैं।
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अंग्रेज अफसर और उनका परिवार था गजक का मुरीद
मेरठी गजक के शौकीन अंग्रेज अफसर और उनका परिवार भी था। रामचंद्र गजक की दुकान संभाल रहे 70 वर्षीय खुशीराम रामचंद्र बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने इस देशी मिठाई की शुरूआत जिस समय की उस दौरान देश में अंग्रेजी हकूमत थी। गजक की चर्चा मेरठ छावनी इलाके में रहने वाले अंग्रेजी अफसरों तक पहुंची तो वे भी गजक मंगाकर खाने लगे। खुशीराम बताते हैं कि 1900 के दशक से ब्रिटेन में गजक की खूब डिमांड हो गई। उन्होंने बताया कि आज भी लोग उनके यहां से गजक खरीदकर ब्रिटेन और अमेरिका तक भेजते हैं।
ठंड के साथ बढ़ती है गजक की मिठास और खास डिमांड
इस मेरठी गजक की डिमांड ठंड बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है। बुढ़ाना गेट में गजक का कारोबार करने वाले मुकेश ने बताया कि गजक सिर्फ सर्दियों के महीने में ही तैयार होती है। इसका स्वाद भी सर्दियों में दुगना होता है। पूरे मेरठ में गजक की करीब पांच हजार से अधिक दुकानें हैं। इन सभी दुकानों से पूरे देश और विदेश में गजक की पूर्ति की जाती है।
पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन के लोग भी हैं मुरीद
मेरठ की गजक के मुरीद पड़ोसी देश पाकिस्तान के दिग्गज राजनीतिज्ञ लोग भी रहे हैं। खुशीराम रामचंद्र बताते हैं कि उनके यहां से नवाज शरीफ,बेनजीर भुटटो, पूर्व राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक के यहां हर साल सर्दी के मौसम में गजक भेजी जाती थी। आज भी पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान और चीन तक गजक की खुशबू महक रही है।