
Gulab Kothari Meerut IIMT University Stree Deh Se Aage: स्त्री को केवल शरीर के रूप में देखने की दृष्टि बदलने की जरूरत है। वह केवल देह नहीं, बल्कि चेतना, संवेदना, सृजन और संस्कार की शक्ति है। परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में उसकी भूमिका को समझे बिना समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। यह विचार पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने आईआईएमटी विश्वविद्यालय में शुक्रवार को आयोजित ‘स्त्री : देह से आगे’ संवाद कार्यक्रम में छात्राओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
कोठारी ने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था ने जीवन की दृष्टि को शरीर तक सीमित कर दिया है। शिक्षा का केंद्र शरीर, उसकी सुविधाएं और सुख बन गया है, जबकि भारतीय चिंतन मनुष्य को केवल शरीर नहीं, आत्मा के रूप में देखता है। उनके अनुसार जब शिक्षा व्यक्ति को स्वयं को समझने, अपनी संवेदना और मानवीय गुणों को विकसित करने से दूर कर देती है तो उसका प्रभाव परिवार और समाज के व्यवहार पर भी दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि स्त्री को केवल देह मानने की दृष्टि ने उसकी वास्तविक भूमिका को सीमित किया है। भारतीय परंपरा में स्त्री को सृजन और शक्ति का आधार माना गया है, लेकिन आधुनिक शिक्षा में स्त्री की विशिष्ट भूमिका पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। उन्होंने छात्राओं से कहा कि वे शिक्षा प्राप्त करें, आगे बढ़ें, अपने पैरों पर खड़ी हों, लेकिन साथ ही अपने भीतर मौजूद संवेदना, ममता, करुणा, वात्सल्य और सृजन की शक्ति को भी पहचानें और विकसित करें।
कोठारी ने कहा कि भारतीय दर्शन में पुरुष और स्त्री को मूल रूप से अलग-अलग नहीं माना गया है। शरीर की भूमिका अलग हो सकती है, लेकिन भीतर की चेतना एक है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दोनों पक्ष मौजूद हैं और समाज को दोनों के संतुलित विकास की आवश्यकता है। लड़कों के पालन-पोषण में भी संवेदना, करुणा और मधुरता जैसे गुणों को उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना लड़कियों में इन गुणों के विकास को दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि समाज में लड़कों को स्वतंत्रता तो दी गई, लेकिन कई बार संस्कार देने की जिम्मेदारी उतनी गंभीरता से नहीं निभाई गई। इसका असर महिलाओं के प्रति व्यवहार में दिखाई देता है। इसलिए केवल लड़कियों को सुरक्षित रहने की सीख देने के बजाय लड़कों को भी जिम्मेदारी, संवेदना और सम्मान का संस्कार देना जरूरी है।
उन्होंने मातृत्व को स्त्री की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक बताते हुए कहा कि मां केवल बच्चे के शरीर का निर्माण नहीं करती, बल्कि उसके संस्कार और व्यवहार को भी आकार देती है। गर्भावस्था से लेकर बचपन तक मां की भूमिका को उन्होंने समाज निर्माण की आधारशिला बताया। उनके अनुसार यदि परिवार में संस्कार और मानवीय मूल्यों का विकास नहीं होगा तो केवल डिग्री और तकनीकी शिक्षा से समाज का निर्माण नहीं हो सकता।
कोठारी ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आज शिक्षा का स्वरूप बड़े पैमाने पर एक जैसा बनाने की दिशा में बढ़ गया है। इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और प्रतिस्पर्धा के साथ संघर्ष भी बढ़ा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को ‘ह्यूमन रिसोर्स’ बनाना नहीं, बल्कि उसे संवेदनशील और संस्कारित मनुष्य बनाना होना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने छात्राओं से कहा कि वे खूब पढ़ें, आगे बढ़ें और अपने जीवन के निर्णय स्वयं समझदारी से लें। उन्होंने कहा कि सफलता केवल पैसा, पद और सुविधाएं हासिल करने में नहीं है। जीवन में सुख और संतोष के लिए व्यक्ति को अपने भीतर भी देखना होगा। उन्होंने छात्राओं से अपनी क्षमताओं और संवेदनाओं को पहचानने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में ओपन माइक के दौरान छात्राओं ने विवाह, मातृत्व, महिला सुरक्षा, अभिभावकों की सोच, पुरुषों के व्यवहार और महिलाओं की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल किए। एक छात्रा ने पूछा कि ‘अच्छी लड़की’ से उनका क्या आशय है। कोठारी ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अच्छी और बुरी लड़की का कोई वर्गीकरण नहीं किया। उनके अनुसार ईश्वर की बनाई कोई भी रचना खराब नहीं है। जरूरत अपनी क्षमताओं और भीतर मौजूद गुणों को पहचानने तथा उनका विकास करने की है।
एक छात्रा ने पूछा कि माता-पिता लड़कियों को बाहर भेजने से क्यों डरते हैं। इस पर कोठारी ने कहा कि पिछली पीढ़ी की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन अब भविष्य की पीढ़ी को बेहतर संस्कार और समझ देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अतीत को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए परिस्थितियां बदली जा सकती हैं।
वहीं विवाह और संतान के संबंध में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि विवाह या संतान किसी व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं है; यह व्यक्तिगत इच्छा और जीवन के निर्णय का विषय है। उन्होंने छात्राओं से कहा कि कोई भी बड़ा निर्णय लेने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना जरूरी है।
कार्यक्रम में एक छात्रा ने यह सवाल भी उठाया कि महिलाओं से जुड़े विषयों पर चर्चा के साथ पुरुषों को भी समान रूप से समझाने की जरूरत है। कोठारी ने कहा कि पुरुष और स्त्री को अलग-अलग खेमों में बांटकर नहीं देखा जा सकता। दोनों मिलकर समाज की इकाई बनाते हैं और दोनों में मानवीय संवेदनाओं का विकास जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान आईआईएमटी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति योगेश मोहन गुप्ता ने कोठारी का स्वागत करते हुए कहा कि ‘स्त्री : देह से आगे’ जैसा विषय छात्राओं के भविष्य के लिए सार्थक है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में स्त्री का सम्मान होता है, वही समाज आगे बढ़ता है। कार्यक्रम के समापन पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिक्षा के पाठ्यक्रम में महिला-केंद्रित विषयों के समावेश की संभावनाओं पर भी काम करने की बात कही।
‘अच्छी लड़की’ से आपका क्या मतलब है?
कोठारी ने कहा- मैंने अच्छी-बुरी लड़की की बात नहीं की। ईश्वर की बनाई कोई रचना खराब नहीं है। जरूरी है कि व्यक्ति अपनी क्षमताओं और ईश्वर से मिली शक्तियों को पहचाने और उनका विकास करे।
क्या लड़की के लिए शादी और बच्चे जरूरी हैं?
उन्होंने कहा कि शादी करना या बच्चे करना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। यह व्यक्ति की इच्छा और उसके जीवन के निर्णय पर निर्भर करता है। हालांकि किसी निर्णय को लेने से पहले उसके भविष्य के प्रभावों को समझना जरूरी है।
लड़कियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल लड़कियों की क्यों?
इस पर उन्होंने कहा कि लड़कों को भी संस्कार देना उतना ही जरूरी है। केवल लड़कियों को सीमाओं में रहने की सीख देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। आने वाली पीढ़ी के लड़के और लड़कियां दोनों संवेदनशील और जिम्मेदार बनें, इस दिशा में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है।
क्या पुरुषों को भी यह समझ नहीं दी जानी चाहिए?
कोठारी ने कहा कि पुरुष और स्त्री को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों मिलकर समाज की इकाई बनाते हैं। इसलिए दोनों में संवेदना, करुणा, ममता और मानवीय गुणों का विकास जरूरी है।
स्वतंत्र होकर काम करना क्या पुरुष बनने की कोशिश है?
इस सवाल पर उन्होंने शिक्षा व्यवस्था और स्त्री की विशिष्ट भूमिका पर अपनी बात रखते हुए कहा कि महिलाओं की शिक्षा में उनकी प्रकृति, संवेदना और जीवन की विशिष्टताओं को भी स्थान मिलना चाहिए। उनका कहना था कि शिक्षा केवल कमाई और रोजगार तक सीमित नहीं होनी चाहिए।