मेरठ

अब इस शहर से शूटर (सुपारी किलर) नहीं नए शूटर (निशानेबाज) निकल रहे हैं, इसके पीछे है दिलचस्प कहानी

बागपत की यह अलग, अनोखी और उम्दा सच्चाई, जो सिर्फ कुछ लोगों को पता है
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Updated: 25 Oct 2018, 9:27 AM IST
bagpat
अब इस शहर से शूटर (सुपारी किलर) नहीं नए शूटर (निशानेबाज) निकल रहे हैं, इसके पीछे है दिलचस्प कहानी

बागपत। बागपत यानी बागियों का इलाका। 90 के दशक तक यहां उद्योग नहीं थे। किसान गन्ने की खेती करते थे। ज्यादातर बेरोजगार युवा अपराध की राह पकड़ लेते थे और तब यह इलाका डकैती और लूट को लेकर चर्चा में आया।
तब तक यहां बड़े पैमाने पर अवैध हथियारों का कारोबार शुरू हो चुका था। बहुत से लोग खुद ही कट्टा बनाना सीख गए थे और काफी कम पैसे लेकर हत्या भी करने लगे। यानी इलाके में उन्हें सुपारी किलर का तमगा मिल गया था।
करीब-करीब उसी समय (वर्ष 1982) दिल्ली के डा. करणी सिंह शूटिंग रेंज में बागपत का एक युवक डोप कंट्रोलर था। नाम था डॉ. राजपाल सिंह। करीब एक दशक पहले वह दिल्ली के एम्स से रिटायर हुए।

राजपाल बागपत मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर जोहड़ी गांव के रहने वाले थे। बाद में वह शूटिंग (निशानेबाजी) के कोच बने। उन्होंने अपने बेटे विवेक को भी कोचिंग दी। विवेक ने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीता और बाद में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
90 का दशक खत्म होने को था और इसके साथ ही बागपत की तस्वीर बदलने वाली थी। यहां के युवाओं से शूटर (सुपारी किलर) का तमगा हटने वाला था और नए शूटर (निशानेबाज) के रूप में सम्मान मिलने वाला था।
इसका जिम्मा लिया खुद राजपाल ने। जब rimeराजपाल दिल्ली में कोच की भूमिका निभा रहे थे, तभी उनके दिमाग में ख्याल आया कि क्यों न अब कुछ अलग किया जाए। बागपत तब अवैध हथियारों और सुपारी किलर शूटरों को लेकर काफी चर्चा में था।
राजपाल ने सोचा कि क्यों न युवाओं को शूटिंग की ट्रेनिंग दें और उन्हें सच में शूटर बनाएं। ऐसा शूटर जो देश के लिए सोना ले आए और देश के साथ-साथ बागपत का नाम भी रोशन करे। उन्होंने इसके लिए कोचिंग अपने गांव जोहड़ी में ही देने का निर्णय लिया।
इसके बाद राजपाल ने जोहड़ी गांव के मंसूर लंबरदार से बात की। मंसूर आज गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं। उनकी एक हवेली है, जिसकी चर्चा बागपत और आसपास के जिलों में होती है। काफी बड़ी इस हवेली में ही सबसे पहले अस्थायी शूटिंग रेंज बनाई गई।
इसके बाद वहां युवाओं को शूटिंग में दिलचस्पी लेने के लिए प्रेरित किया गया। परिवारों को मनाया गया कि वे अपने बच्चों को शूटिंग सीखने के लिए भेजेंं। इसके बाद बागपत ने पीछे मुडक़र नहीं देखा।
आज भारत में शूटिंग (निशानेबाजी) में सबसे ज्यादा कोच अगर कहीं के हैं तो वह बागपत के हैं। यही नहीं, निशानेबाजी में सबसे ज्यादा अगर शूटर कहीं के हैं, तो वह बागपत है।
निशानेबाजी में बागपत हब बन चुका है। यही नहीं शायद महाभारत में भी अगर सबसे सटीक निशाने साधने वाले तीरंदाज रहे होंगे तो वह जरूर बागत होगा, क्योंकि यही वह इलाका है जहां महाभारत का युद्ध हुआ।

हाल ही में यूथ ओलंपिक में गोलड जीतने वाले सौरभ चौधरी ने बागपत से ही शूटिंग की ट्रेनिंग की है।

Updated on:
25 Oct 2018, 9:27 AM IST
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