
नई दिल्ली: रोहिंग्या मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 15 पन्नों को हलफनामा दायर कर कहा कि बहुत से रोहिंग्याओं को आईएसआई और आईएस के समर्थन में देखा गया है, जो भारत में अपने उद्देश्यों को पूरा होते देखना चाहते हैं। यहां तक कि कई जगह संवेदनशील इलाकों में साम्प्रदायिक उन्माद को भड़काने में भी इन लोगों की भूमिका रही है।' सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आगे कहा कि संविधान में देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी आने-जाने और बसने का अधिकार दिया गया है। लेकिन यह अधिकार गैर कानूनी ढंग से देश में रह रहे लोगों के लिए नहीं है।
2012-13 से रोहिंग्याओं के आने का सिलसिला जारी
गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में लिखा कि भारत में गैर कानून ढंग से रोहिंग्याओं का आना साल 2012-13 में शुरू हो गया था। तब से सांप्रदायिक दंगे और हिंसा भड़काने में इन लोगों की अहम भूमिका रही है। इसके बाद देश की सुरक्षा और खुफिया एजेंसी और कई अधिकारिक जगहों से ऐसी जानकारी मिली है कि गैर कानूनी ढंग से भारत में रह रहे कुछ रोहिंग्याओं का पाकिस्तान के आतंकी समूहों या उस जैसे समूहों से संबंध है।' ऐसे में ये समुदाय देश के लिए खतरा है। हलफनामे में कहा गया कि म्यांमार से आने वाले रोहिंग्या एजेंट और दूसरे जरियों से पश्चिम बंगाल के हरिदासपुर, हिली और त्रिपुरा के सोनामोरा के रास्ते पूरे भारत में फैल रहे हैं। यह स्थिति देश की सुरक्षा के लिए खतरा है।
3 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानवलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड की बेंच ने इंटेलिजेंस इनपुट और इससे जुड़ी जानकारी सील किए हुए लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में जमा करने की बात कही। मामले की अगली सुनवाई 3 अक्टूबर को ही होगी। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में कहा, 'भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है। यहां का ढांचा काफी अलग है। यहां गैर कानूनी ढंग से रह रहे लोगों को सुविधा और संसाधन मुहैया कराने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं है।