सोमवार को मुख्‍य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने सुनवाई टालने के केंद्र सरकार के प्रस्‍ताव को मानने से इनकार कर दिया था।
नई दिल्ली। समलैंगिकता को लेकर कानूनी संघर्ष जारी है। इस पर अंतिम राय कायम करने के लिए आज से सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। इसके लिए गठित संविधान पीठ इस बात पर गौर फरमाएगी कि सहमति से दो वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध अपराध की श्रेणी में आता है या नहीं। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित कर दिया था। इसके विरोध में समलैंगिक संबंधों को फिर से अपराध की श्रेणी में शामिल करने के शीर्ष अदालत के फैसले को कई याचिकाओं के जरिए चुनौती दी थी। आज से इसी मसले पर संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई होगी।
सुनवाई स्थगित करना संभव नहीं
केंद्र सरकार ने इन याचिकाओं पर पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ से प्रस्तावित सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध सोमवार को किया था जिसे शीर्ष अदालत ने ठुकरा दिया। सोमवार को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने सुनवाई टालने से इनकार कर दिया था। केंद्र सरकार ने समलैंगिक संबंधों पर जनहित याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए और वक्त देने का अनुरोध किया था। लेकिन पीठ ने कहा कि इसे स्थगित नहीं किया जाएगा।
पांच सदस्यीय पीठ करेगी सुनवाई
इस मामले में नए सिरे से पुनर्गठित पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को चार महत्वपूर्ण विषयों पर सुनवाई शुरू करनी है जिनमें समलैंगिकों के बीच शारीरिक संबंधों का मुद्दा भी है। नवगठित संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं।
शीर्ष अदालत ने 2013 में माना था अपराध
सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में समलैंगिक वयस्कों के बीच संबंधों को अपराध माना था। न्यायालय ने समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को रद्द कर दिया था। इसके बाद पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं और उनके खारिज होने पर प्रभावित पक्षों ने मूल फैसले के नए अध्ययन के लिए सुधारात्मक याचिकाएं दाखिल की थीं। सुधारात्मक याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान अर्जी दाखिल की गई कि खुली अदालत में सुनवाई होनी चाहिए जिस पर शीर्ष अदालत राजी हो गया। इसके बाद धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के लिए कई रिट याचिकाएं दाखिल की गईं।