
नई दिल्ली। जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने घाटी में पहली बार पथराव करने वाले युवाओं के खिलाफ दायर एफआईआर को वापस लेने के फैसले का ऐलान किया है। महबूबा ने बुधवार रात को ट्वीट कर कहा कि पहली बार पत्थरबाजों के खिलाफ एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया को दोबारा शुरू कर मुझे अत्यंत संतुष्टि मिली है। महबूबा ने कहा कि मेरी सरकार ने यह प्रक्रिया मई 2016 में ही शुरू कर दी थी लेकिन दुर्भाग्यवश घाटी में फैली अशांति की वजह से यह प्रक्रिया रूक गई थी।
विशेष प्रतिनिधि के प्रस्ताव पर केन्द्र का कदम
उन्होंने कहा कि यह उन युवा लड़कों और उनके परिवार वालों के लिए आशा की एक किरण है। यह पहल उन्हें अपने भविष्य के निर्माण का दोबारा अवसर प्रदान कराएगा। गौरतलब है कि जम्मू एवं कश्मीर मसले पर केंद्र सरकार के विशेष प्रतिनिधि के सुझाव पर विचार करते हुए यह फैसला उठाया गया है ताकि कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए वार्ता जारी रखने हेतु सभी हितधारकों में विश्वास बढ़े। बता दें कि केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त किए गए नए वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा कश्मीर में शांति स्थापना को लेकर अलग—अलग गुटों से वार्ता कर रहे हैं। सरकार की यह पहल भी दिनेश्वर शर्मा के प्रस्ताव पर आधारित मानी जा रही है। वहीं कुछ लोगों का मानना है की इससे पहले भी सरकार ने कई बार वार्ताकारों को राज्य में भेजा, लेकिन उनकी सिफारिशों को अनदेखा कर दिया। साथ ही शीर्ष हुर्रियत नेतृत्व पहले ही कह चुका है कि वह सरकार के दूतों से बात नहीं करेगा।
कब-कब क्या हुआ...
2010 में यूपीए सरकार ने तीन सदस्यीय दल, जिनमें दिवंगत पत्रकार दिलीप पडगांवकर, राधाकुमार और एम.एम अंसारी शामिल थे, के नेतृत्व में वार्ताकारों का एक समूह गठित किया था| वार्ताकारों के समूह ने जम्मू-कश्मीर के तीनों क्षेत्रों में यात्रा की और सभी हितधारकों से बातचीत करके 2011 में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम को अपनी रिपोर्ट सौंप दी| वार्ताकारों ने कश्मीर पर लगातार बातचीत की आवश्यकता पर ज़ोर दिया| उन्होंने मांग की कि राज्य के अलग संवैधानिक को बहाल रखा जाए और सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम को निरस्त किया जाए, परंतु उस रिपोर्ट की सिफारिशें ठंडे बस्ते के हवाले हो गईं।