
नई दिल्ली। गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के 93 वर्ष पूरे होने के अवसर पर नागपुर में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया है। इस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी शामिल हो रहे हैं। यही कारण है कि सत्ताधारी दल और विपक्ष एक-दूसरे के सामने आ गए हैं। अपने राजनीतिक करियर में कुछ वर्ष पहले प्रणब मुखर्जी संघ के मुखर विरोधी थे लेकिन अब इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर कांग्रेस ने सवाल खड़े किए हैं। बहरहाल ये राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई तो यूं ही चलती रहेगी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने 93 वर्ष के इतिहास में संघ को कई विरोधों का सामना करना पड़ा और राजनीतिक लड़ाई में सरकार ने उस पर प्रतिबंध भी लगाए। देश की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बीच संघ पर सरकार ने तीन बार प्रतिबंध लगाए। आइए जानते हैं वह कौन-कौन से वह मौके थे जब संघ को प्रतिबंध का सामना करना पड़ा…
1. महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में लगी प्रतिबंध
आपको बता दें कि 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के दिन डॉ. केशव बलराम हेडगेवार ने संघ की नींव महाराष्ट्र के नागपुर में रखी। आरएसएस पर पहली बार आजादी के तुरंत बाद प्रतिबंध लगाया गया। 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में संघ पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। दरअसल गांधी जी की हत्या को संघ से जोड़ कर देखा गया और फिर आरएसएस के दूसरे संघ सरचालक गुरु गोलवलकर को बंदी बना लिया गया। 18 महीने तक संघ पर प्रतिबंध लगा रहा। लेकिन 11 जुलाई 1949 को तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कुछ शर्तों के साथ संघ से प्रतिबंध हटा लिया। संघ प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवलकर ने गृहमंत्री की सभी शर्तें मान लीं। इन शर्तों में कहा गया कि संघ अपना संविधान बनाए और उसे प्रकाशित करे, जिसमें लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुनवा होंगे। साथ ही यह भी कहा गया कि आरएसएस राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहेगा और केवल सांस्कृतिक गतिविधियों में हीं हिस्सा लेगा। शर्त के मुताबिक संघ हिंसा और गोपनियता का त्याग करे तथा भारत के ध्वज और संविधान के प्रति वफादार रहने की शपथ ले।
2. आपातकाल के दौरान लगी पाबंदी
आपको बता दें कि देश में आपातकाल के दौरान संघ पर दूसरी बार प्रतिबंध लगाया गया था। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में पहली बार राजनीतिक रूप से आपातकाल लगाया गया तब संघ के लोगों ने इसका काफी विरोेध किया था। इसके कारण सैकड़ों स्वयं सेवकों को जेल भेज दिया गया। आरएसएस पर 2 वर्ष तक पाबंदी लगी रही। लेकिन जब आपातकाल खत्म हो गया और आम चुनाव हुए तो जनता पार्टी और जनसंघ के विलय से बनी जनता पार्टी सत्ता में काबिज हुई, तब संघ से एख बार फिर प्रतिबंध हटा लिया गया।
3. बाबरी मस्जिद मामले में लगा प्रतिबंध
आपको बता दें कि आरएसएस को तीसरी बार अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाने में भूमिका के कारण प्रतिबंधित किया गया। 1992 में अयोध्या में कार सवेकों ने हमला कर बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था। इसमें कथित तौर पर कहा गया कि यह आरएसएस के मिलीभगत से हुआ है। सरकार ने कार्रवाई करते हुए प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि संघ पर यह प्रतिबंध ज्यादा दिनों तक नहीं रहा और 6 महीने बाद सरकार ने एक बार फिर से प्रतिबंध को हटा लिया।
संघ का दावा
आपको बता दें कि संघ अपने आपको एक सांसकृतिक संगठन होने का दावा करता है। संघ का दावा है कि उसके पास एक करोड़ से ज्यादा प्रशिक्षित सदस्य हैं। संघ परिवार में 80 से ज्यादा आनुषांगिक संगठन हैं। सबसे बड़ी बात की दुनिया के करीब 40 देशों में संघ सक्रिय रूप से काम कर रहा है। मौजूदा समय में हर दिन 56 हजार569 शाखाएं लगती हैं और करीब 13 हजार 847 साप्ताहिक मंडली और 9 हजार मासिक शाखाएं भी लगती है। संघ के अनुसार आरएसएस के सदस्यों का पंजीकरण नहीं होता है। इसतरह से एक अनुमान के मुताबिक फिलहाल देश में 50 लाख से अधिक स्वयंसेवक नियमित रुप से शाखाओं में आते हैं।