महाभियोग के मामले को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक जंग छिड़ गई और कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।
नई दिल्ली। काफी समय से चल रहे राजनीतिक हलचलों का तूफान उस वक्त सबके सामने आया जब कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश कर दिया। बता दें कि राज्य सभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ये जानकारी दी थी।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया। जिसके बाद से मामले को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक जंग छिड़ गई और कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरु कर दिए। हालांकि किसी ने मामले पर पक्ष में ट्वीट किया तो किसी ने विपक्ष में।
पढ़ें ऐसे ही कुछ ट्वीट्स-
गौरतलब है कि अगर राज्य सभा के अध्यक्ष ने ये प्रस्ताव मान लिया तो दीपक मिश्रा महाभियोग का सामना करने वाले देश के पहले चीफ जस्टिस होंगे। साल के शुरू में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से नाराज चार जजों ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके अदालत में चल रही अनियमितताओं का जिक्र किया था जिसके बाद से चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा कटघरे में आ गए और उन पर महाभियोग की बात शुरु हो गई।
क्या होता है महाभियोग
महाभियोग एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की बात कही जाती है। महाभियोग का जिक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में किया गया है। संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित होने पर महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है।
इसे किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है लेकिन लोकसभा में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों की सहमती होनी चाहिए और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसद इससे सहमत हों। इसके बाद उस सदन के स्पीकर या अध्यक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर सकते हैं और खारिज भी।
स्वीकार की स्थिति में तीन सदस्यों की एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है। जांच में दोषी साबित होने पर सदन में वोटिंग कराई जाती है। अगर दोनों सदन में ये प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है। किसी जज को हटाने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास होता है।