विश्‍व की अन्‍य खबरें

68 साल पहले उत्‍तर और दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध को खत्‍म कराने में भारत ने निभाई थी अहम भूमिका

उत्‍तर और दक्षिण कोरिया के बीच विनाशकारी युद्ध को खत्‍म कराने में नेहरू ने निभाई थी मध्‍यस्‍थ भूमिका।

2 min read
Jun 12, 2018
68 साल पहले उत्‍तर और दक्षिण कोरिया के बीच युद्ध को खत्‍म कराने में भारत ने निभाई थी अहम भूमिका

नई दिल्‍ली। ट्रंप और किम जोंग के बीच पहली आधिकारिक वार्ता के बाद कोरियाई प्रायद्वीप संकट टलता नजर आने लगा है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि उत्‍तरी और दक्षिण कोरिया के बीच 68 साल पहले भी आपसी हितों को लेकर विनाशकारी युद्ध हुआ था। उस समय दक्षिण कोरिया के पक्ष में अमरीका था जबकि उत्‍तर कोरिया के पक्ष में चीन और रूसी सेनाएं खड़ी थीं। लेकिन अमरीका के सख्‍त रवैये को देखते हुए चीन के शीर्ष नेता चाऊ एन लाई के कहने पर नेहरू ने समस्‍या का समाधान निकालने के लिए मध्‍यस्‍थता की थी। इसमें नेहरू को सफलता मिली और उन्‍होंने दोनों देशों को महाविनाश की विभीषिका झेलने के अभिशप्‍त होने से बचा लिया था। इस घटना के बाद भारत की छवि दुनिया भर में एक तटस्‍थ देश की बनीं। अमरीका के नजरिए में भी बदलाव आया।

किम इल सुंग ने बोला था हमला
दरअसल शीत युद्ध के बाद आपसी हितों को लेकर उत्‍तर और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव बढ़ गया था। 25 जून, 1950 को उत्‍तर कोरिया के तत्‍कालीन शासक व किम जोंग के दादा किम इल सुंग चीनी नेता चाऊ एन लाई और रूस के शासक स्‍टालिन की शह पर दक्षिण कोरिया पर हमला बोल दिया था। कुछ ही दिनों में दक्षिण कोरिया का एक बड़ा हिस्‍सा उत्‍तर कोरिया के कब्‍जे में चला गया और द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद एक और बड़ा युद्ध शुरू हो गया। हालात को बेकाबू होता देख अमरीका ने अपने विमान वाहक पोत कार्ल विल्सन को पश्चिमी प्रशांत महासागर में तैनात कर दिया। दूसरी तरफ अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से एक प्रस्ताव पारित करवा लिया। इससे अमरीका को संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले सहयोगी देशों की सेना के साथ दक्षिण कोरिया की मदद करने का अधिकार मिल गया। इससे पहले कि पूरा दक्षिण कोरिया, किम इल सुंग के कब्जे में आता वहां अमरीका के नेतृत्व में दस लाख सैनिक पहुंच गए। इसकी वजह से प्रायद्वीप में तनाव चरम पर पहुंच गया। अमरीका ने दक्षिण कोरिया के बहुत बड़े हिस्‍से को उत्‍तर कोरिया के कब्‍जे से मुक्‍त करा लिया। साथ ही अमरीकी सेना उत्तर कोरिया में चीन की सीमा के नजदीक बढ़ रही थी। चीन की कम्युनिस्ट सरकार के लिए ये परिस्थितियां स्वीकार्य नहीं थी।

ये भी पढ़ें

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा उम्मीद से अच्छी रही मुलाकात, किम जोंग ने साइंस फिल्म जैसा बताया

चाऊ एन लाई ने नेहरू से लगाई थी मध्‍यस्‍थता की गुहार
तत्‍कालीन प्रभावशाली चीनी नेता चाऊ एन लाई ने इस खतरे को भांपते हुए बीजिंग में भारतीय राजदूत के जरिए नेहरू को संदेश भिजवाया कि यदि अमरीका ने उत्तर कोरिया पर कब्जा करने की कोशिश की तो वह शांत नहीं बैठेगा और भारतीय प्रधानमंत्री को यह बात वाशिंगटन तक पहुंचानी चाहिए। नेहरू को चीन के इरादों पर कोई शक नहीं था। उन्होंने यह चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन तक पहुंचा दी। हालांकि इसका कोई असर नहीं हुआ। चीन की कम्युनिस्ट सरकार के लिए ये परिस्थितियां स्वीकार्य नहीं थी। नेहरू की पहल को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध बंदियों की अदला बदली के लिए भारत की अध्यक्षता में एक आयोग के गठन को सहमति दी थी। इसमें पांच और देश भी शामिल थे। भारत के प्रयासों करीब डेढ़ साल तक चली बातचीत के बाद सफलता मिली और दोनों पक्ष युद्ध विराम के लिए सहमता हो गए और उसी के साथ महाविनाश का संकट भी दोनों देशों पर से टल गया। इस घटना के बाद यूएन ने भारत के प्रयासों की सराहना की। नेहरू के इस रुख के बाद भारत को दुनिया भर में एक तटस्‍थ राष्‍ट्र की छवि बनी।

ये भी पढ़ें

अमरीका: उत्तर कोरिया परमाणु कार्यक्रम छोड़े, हम उसे देंगे सुनहरा भविष्य
Published on:
12 Jun 2018 01:05 pm
Also Read
View All