इंसान को दोबारा ज़िंदा करने के लिए स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि एक खास थ्योरी की मदद से मृत इंसान को फिर से ज़िंदा किया जा सकता है।
नई दिल्ली। आज से करीब 58 साल पहले यानि 1960 में वैज्ञानिकों ने पहली बार मरे हुए इंसानों को फिर से ज़िंदा करने के लिए काम करना शुरु कर दिया था। वैज्ञानिकों की इस कोशिश को दुनिया भर के लोगों ने मज़ाक बताया था। क्योंकि हम इस बात पर कतई भरोसा नहीं करेंगे कि एक इंसान मरने के बाद ज़िंदा हो भी सकता है। लेकिन हम ये बात भी नहीं भूल सकते कि जिन वैज्ञानिकों की कोशिशों को हमने पहले भी बेवकूफी बताया था, आज हम उन्हीं की देन और तकनीक पर मौज काट रहे हैं।
लेकिन इंसानों को मरने के बाद फिर से ज़िंदा करने के लिए अमेरिका के कई वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक कर रखा है। इंसान को दोबारा ज़िंदा करने के लिए स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि एक खास थ्योरी की मदद से मृत इंसान को फिर से ज़िंदा किया जा सकता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इन वैज्ञानिकों की मेहनत को सलाम करने के बजाए लोग उनका मज़ाक बना रहे हैं।
बता दें कि 1960 में पहली बार किए गए प्रयोग का एक वीडियो भी बनाया गया था। लेकिन उस वीडियो के एक बार फिर से सामने आने के बाद बहस फिर से छिड़ गई है। लोग इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि मरे हुए इंसान को फिर से ज़िंदा किया जा सकता है। बताते चलें कि इस प्रयोग में वैज्ञानिक एक ट्यूब की तरह दिखने वाले फ्रिज में डेड बॉडी को संरक्षित रखते हैं। जिसमें शरीर को एल्युमिनियम की शीट में पैक करके रखते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस फ्रिज का तापमान -250 डिग्री पर सेट किया गया है। वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया का नाम क्रायोप्रिजर्वेशन रखा गया है।
बताते चलें कि साल 2014 में 250 अमरीकियों की इच्छामृत्यु के बाद सभी की डेड बॉडी को वैज्ञानिकों ने इसी तरह की फ्रिज में संरक्षित किया है। वैज्ञानिकों के साथ-साथ इच्छामृत्यु करने वाले सभी लोगों को उम्मीद थी कि वे आगे चलकर एक बार फिर से ज़िंदा हो जाएंगे।