BRI चीन की एक महत्वकांक्षी परियोजना है। इस परियोजना के अंतर्गत 6 कोरिडोर का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना के माध्यम से चीन वैश्विक बाजार में एकाधिकार स्थापित करना चाहता है।
नई दिल्ली। एशियाई देशों के अंदर लगातार भारत के बढ़ते प्रभाव को कम करने और दुनिया में एक नई महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करने के लिए चीन हर उस योजना पर काम कर रहा, जिससे की उसे यह लक्ष्य हासिल करने में कोई परेशानी न हो। इसके लिए चीन जल, थल और नभ में हर तर का प्रयास कर रहा है। इसी में से चीन की एक महत्वकांक्षी परियोजना है- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ( BRI )। इस परियोजना के माध्यम से चीन दुनियाभर में अपने वर्चस्व का स्थापित करने की योजना बना रहा है। लेकिन अब कुछ सवाल उभर रहे हैं कि आखिर दुनिया के बाकी देश चीन को इस परियोजना में क्यों मदद करेंगे? इस परियोजना से किसको फायदा होगा? कौन से देश को कितना फायदा होगा? इन्हीं सवालों के संदर्भ में हम यह जानने की कोशिश करेंगे की आखिर BRI क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ( BRI ) क्या है?
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव ( BRI ) चीन की एक महत्वकांक्षी परियोजना है। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में यूरोप, एशिया, मध्य पूर्व, लैटिन अमरीका और अफ्रीका के अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश को शामिल किया है। इस परियोजना के अंतर्गत चीन छह कॉरिडोर का निर्माण करवा रहा है जो एशिया और अफ्रीका को सीधे जोड़ेगा। इस कॉरिडोर का उद्देश्य क्षेत्रीय एकीकरण में सुधार, व्यापार में वृद्धि और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। BRI का भौगोलिक दायरा लगातार बढ़ रहा है। अब तक 70 से अधिक देश इस परियोजना के साथ जुड़ चुके हैं, जो कि दुनिया की लगभग 65 प्रतिशत आबादी है और दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग एक-तिहाई है।
BRI की पांच प्रमुख प्राथमिकताएं परिभाषित की गई हैः
1. नीति समन्वय
2. बुनियादी ढांचा कनेक्टिविटी
3. बिना लाइसेंस के व्यापार
4. वित्तीय एकीकरण
5. लोगों को जोड़ना
किसको कितना फायदा?
एशियाई देश हो या फिर अफ्रीकी या अमरीकी हर देश के विकास के लिए उर्जा पहली जरूरत होती है। बिना उर्जा जरूरतों को पूरा किए हुए देश का विकास कठिन है। चीन दुनिया की महाशक्ति बनना चाहता है। लिहाजा उर्जा जरूरतों के लिए गल्फ देशों पर निर्भर है। साथ ही चीन को अपने उत्पादों को बेचने के लिए एक बड़े बाजार की जरूरत है। दरअसल बहुत सारे अफ्रीकी व गल्फ देश आर्थिक तौर पर मजबूत नहीं है। लिहाजा चीन इसका फायदा उठाना चाहता है। विश्व के कुल व्यापार का 90 फ़ीसदी हिस्सा समुद्री रास्तों से होकर जाता है और इस तरह मालवाहक पोत एक देश से दूसरे देश को जाते हैं। इससे किसी तीसरे देश को फायदा या नुकसान की संभावना नहीं रहती है। लेकिन चीन ने अब BRI प्रोजेक्ट को शुरु किया है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद से दुनिया में होने वाले वैश्विक व्यापार की तस्वीर बदल जाएगा। इस परियोजना के पूरा होने से समुद्री रास्तों पर निर्भरता कम हो जाएगी और चीन सीधे-सीधे अपने उत्पादों को दूसरे देशों में कम समय में निर्यात कर सकता है।
चीन का दबदबा?
अभी देखें तो समुद्री रास्तों पर अमरीका का दबदबा है और चीन अमरीका को पीछे छोड़कर दुनिया का महाशक्ति बनना चाहता है। चीन जमीनी रास्तों के जरिए रूस और जर्मनी जैसी महाद्वीपीय शक्तियां हासिल करना चाहता है, क्योंकि जापान और अमरीका जैसी समुद्री क्षेत्र की महाशक्तियों को सीमित कर बहुध्रुवीय वैश्विक राजनीति को सुनिश्चित करने के लिए चीन के पास बेहतरीन मौका है। लिहाजा चीन आर्थिक तौर पर कमजोर देशों को साथ जोड़ते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना चाहता है। BRI के सदस्य दशों को भी फायदा होगा। उन देशों में आर्थिक संपन्नता आ सकती है, लेकिन चीन की शर्त पर। ऐसा इसलिए है, क्योंकि चीन BRI के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर देशों के साथ व्यापारिक समझौता कर रहा है। इससे चीनी उत्पादों को एक विश्व बाजार उपलब्ध होगा। चीनी कंपनिया बिना किसी रोकटोक और बिना लाइंसेस के व्यापार कर सकती है। यही कारण है कि चीन ने समुद्री रास्ते के बजाए जमीनी रास्ते को विकसित करने पर ज्यादा ध्यान दिया है। इससे एशिया में पश्चिमी दबदबा खत्म हो जाएगा और चीन का एकाधिकार स्थापित हो जाएगा। चीन इसके जरिए वैश्विक व्यापार को नियंत्रित कर सकता है। यदि दुनिया का बादशाह बनना है तो इसके लिए चीन को उन रास्तों पर नियंत्रण करना ही होगा जिनसे होकर व्यापार होता है।
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