इस बार मौसम विभाग की ओलावृष्टि और बारिश की चेतावनी ने भले ही किसानों की चिंता बढ़ाई, लेकिन प्रदेश के कुछ हिस्सों में भविष्यवाणी के विपरीत परिस्थिति ने फसलों को तबाह कर दिया है। मौसम की मार से तबाह फसलों का असर अब आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने वाला है...पढ़ें पूरी खबर...
नहर किनारे सिकरवारी क्षेत्र के 50 से अधिक गांवों में 10 हजार बीघा से अधिक खेतों में खड़ी सरसों फसल में पीलिया रोग फैल गया है। जिससे सरसों के पौधे की पत्तियां सूख गई हैं। वहीं फलियां भी अंदर से खोखली हो गई हैं। इसका असर यह होगा कि सरसों का उत्पादन 30 प्रतिशत तक घट जाएगा। जिससे सरसों उत्पादक किसानों की ङ्क्षचता बढ़ गई है। अंचल के किसान फरवरी महीने में ओलावृष्टि और बारिश की आशंका से ङ्क्षचतित थे। हालांकि अंचल में ओलावृष्टि तो नहीं हुई। लेकिन सरसों फसल में पीलिया रोग जरूर फैल गया। नहर किनारे स्थित 50 से अधिक गांवों में खेतों में खड़ी फसल में पोलियो रोग व फफूंदजनित रोग फैलने की वजह से सरसों के पौधे जहां सूखने लगे हैं। वहीं फलियां अंदर से खोखली हो गई हैं, जिससे सरसों का दाना नहीं बनने से सरसों का उत्पादन कम हो जाएगा।
इन गांवों में सरसों फसल में फैला पोलिया रोग सिहोरी, तुस्सीपुरा, खांड़ौली, इमलिया, खुलावली, गुढ़ा चंबल, बराहना, नंदपुरा, देवगढ़, ल्हौरी का पुरा, विडवा, पठानपुरा, पंचमपुरा, सुखपुरा, ताजपुर, तोर-तिलावली, ङ्क्षडडोखर, गुर्जा, कोल्हूडांड़ा, कोटरा, मिलौआ, बृजगढ़ी, हुसैनपुर।
सरसों में पोलियो रोग से यह होता है असर
इस रोग से प्रभावित पौधे अंदर से पोले हो जाते हैं. इनमें सफेद फफूंद की वजह ेसे काले रंग के टेढ़े-मेढ़े स्केलोरोशिया दिखाई देते हैं. इस रोग की शुरुआत पत्तों से होती है. पत्तियों पर गोलाई लिए छितराए काले धब्बे दिखाई देते हैं। धब्बे छल्लेनुमा आकार में बढ़ते हैं। धीरे-धीरे रोग की उग्रता पूरी पत्ती पर फैल जाती है और पत्तियां नीचे गिर जाती हैं। रोग की गंभीर अवस्था में पत्तियां सूखकर गिर जाती हैं, जिससे पौधे कमजोर रह जाते हैं। यह रोग पुष्पक्रम को भी प्रभावित करता है। विकृत पुष्पक्रमों पर फलियां नहीं बनती।
इस बार ज्यादा फैल गया है रोग
सरसों फसल में पोलियो रोग वैसे तो हर साल फैलता है, लेकिन इस बार ज्यादा फैल गया है, जिससे सरसों का उत्पादन घटेगा।
- डॉ. संदीप सिंह, कृषि वैज्ञानिक, आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र मुरैना
करें ये उपाय
1. मेनकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 2 से 3 छिड़काव 10 दिन के अंतर से 45, 55 एवं 65 दिन की फसल पर करें।
2. बीजोपचार के लिए मेटेलेक्सिस समूह की दवा (एप्रोन 35 एसडी) 6 ग्राम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचार करें।
3. खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखें तो परणीय छिड़काव करें। इसके लिए रिडोमिल एम जेड-3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की घोल बनाकर स्प्रे करें।
4. रोग पर नियंत्रण के लिए इंडोफिल एम-45 या कैह्रश्वटन 260 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करना चाहिए।