Dawood Ibrahim: 1993 मुंबई धमाकों के मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम का भारत में छूटा काला साम्राज्य अब खत्म हो रहा है। पाकमोडिया स्ट्रीट से भिंडी बाजार तक, जानें डॉन की उन संपत्तियों का हाल जो अब नीलाम हो चुकी हैं।
Dawood Ibrahim:महाराष्ट्र में अंडरवर्ल्ड की बात हो और दाऊद का जिक्र न हो, तो वह चर्चा अधूरी रहती है। आज भी 1993 में हुए सिलसिलेवार धमाकों को याद किया जाता है, तो सीना दहल उठता है। दिन शुक्रवार का था और तारीख 12 मार्च। अचानक मुंबई में चारों तरफ बम की आवाज गूंजने लगी। धमाकों की आवाज ऐसी थी मानो समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न हो गया हो। यह वही वक्त था, जब गुनाहों का सौदागर दाऊद इब्राहिम सरहद पार सुरक्षित पनाहगाह तलाश चुका था। दाऊद भले ही खुद भारत से भाग निकला, लेकिन पीछे वह जुल्म की दुनिया से खड़ा किया गया अपना अकूत काला साम्राज्य छोड़ गया, जो आज सरकारी नीलामी के हथौड़े के नीचे अपनी पहचान खो रहा है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, दाऊद इब्राहिम को पहले ही इस बात का अंदेशा हो गया था कि उसके खिलाफ कानून का शिकंजा कसने वाला है, इसलिए उसने समय रहते देश छोड़ने की योजना बना ली थी। 1980 के दशक के अंत में उसने मुंबई को अलविदा कहकर दुबई को अपना नया ठिकाना बना लिया, जहां से वह दूर बैठकर ही अपने आपराधिक नेटवर्क और अवैध कारोबार को नियंत्रित करता रहा। दुबई में रहते हुए उसने अपने गिरोह को और मजबूत किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच बढ़ाई। इसके बाद 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार 12 बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया। जैसे ही इन धमाकों की जांच में दाऊद इब्राहिम का नाम सामने आया और उसके खिलाफ कार्रवाई तेज हुई, वह दुबई से भी फरार हो गया और पाकिस्तान की सरपरस्ती में जाकर छिप गया, जहां से वह लंबे समय तक अपने नेटवर्क को संचालित करता रहा।
दाऊद इब्राहिम के फरार होने के बाद भी दक्षिण मुंबई के नागपाड़ा, भिंडी बाजार और पाकमोडिया स्ट्रीट जैसे इलाकों में उसकी अरबों की बेनामी संपत्तियां मौजूद रहीं। पाकमोडिया स्ट्रीट स्थित डांबरवाला बिल्डिंग को उसका मुख्य गढ़ माना जाता था, जो कभी उसकी दहशत का प्रतीक थी। वहीं, होटल रौनक अफरोज, जिसे बाद में ‘दिल्ली दरबार’ के नाम से जाना गया, उसकी रसूखदार संपत्तियों में शामिल था। भिंडी बाजार स्थित शबनम गेस्ट हाउस की देखरेख उसकी बहन हसीना पारकर उर्फ ‘आपा’ करती थी। इसके अलावा माटुंगा और नागपाड़ा क्षेत्रों में दर्जनों फ्लैट्स और दुकानें भी थीं, जिन्हें बेनामी नामों से खरीदा गया था और जो उसके काले साम्राज्य का अहम हिस्सा मानी जाती थीं।
शुरुआत में दाऊद की संपत्तियों को छूने की हिम्मत कोई नहीं करता था। 'सफेमा' (SAFEMA) कानून के तहत जब सरकार ने जब्ती शुरू की, तो नीलामी के दौरान सन्नाटा पसरा रहता था। लेकिन समय बदला और समाजसेवियों व निडर व्यापारियों ने आगे आकर इन संपत्तियों को खरीदा। आज इन इमारतों पर या तो सरकारी बोर्ड लगे हैं या वहां नए निर्माण हो रहे हैं। दाऊद की छोड़ी हुई इन जमीनों का ढहना इस बात का प्रतीक है कि कानून के हाथ अपराधी से कहीं ज्यादा लंबे और मजबूत होते हैं।