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DY Patil Passes Away: 1 लाख की सैलरी छोड़ सिर्फ लेते थे 1 रुपये, पढ़ें पद्मश्री डीवाई पाटील के जीवन के अनसुने किस्से

DY Patil Demise: देश के प्रमुख शिक्षाविदों में शुमार, पद्मश्री डॉ. डीवाई पाटिल का महाराष्ट्र के कोल्हापुर में निधन हो गया है। 90 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।
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Updated: 4 Aug 2026, 3:52 PM IST
DY Patil passes away
महाराष्ट्र में मंत्री रह चुके हैं डॉ. डीवाई पाटील (Photo: X/@surya_14kumar)

Dr DY Patil: देश के प्रसिद्ध शिक्षाविद, समाजसेवी और पूर्व राज्यपाल पद्मश्री डॉ. डीवाई पाटिल का 90 वर्ष की आयु में मंगलवार को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में निधन हो गया। उनके निधन से शिक्षा जगत, खेल और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है। एक छोटे से गांव से निकलकर देशभर में शिक्षा का विशाल साम्राज्य खड़ा करने वाले डॉ. पाटिल अपनी सादगी, समाजसेवा और विनम्र स्वभाव के लिए भी हमेशा याद किए जाएंगे।

शिक्षा के अलावा डॉ. पाटिल ने प्रशासनिक क्षेत्र में भी काम किया। वह बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। राजनीति से दूरी बनाने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा और समाजसेवा को समर्पित कर दिया। उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

राज्यपाल रहते हुए लिया सिर्फ 1 रुपये का वेतन

डॉ. डीवाई पाटिल त्रिपुरा के 12वें राज्यपाल रहे। उस समय राज्यपाल को हर महीने 1 लाख 10 हजार रुपये वेतन मिलता था, लेकिन उन्होंने सरकारी वेतन लेने से इनकार कर दिया और प्रतीकात्मक रूप से सिर्फ 1 रुपये प्रति माह मानदेय स्वीकार किया।

यह फैसला उनकी सादगी और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण माना जाता है।

खेलों के ऐसे दीवाने, जिन्होंने सरकारी खर्च पर कभी यात्रा नहीं की

डॉ. पाटिल को खेलों, खासकर क्रिकेट और ओलंपिक से गहरा लगाव था। उन्होंने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक और 2008 के बीजिंग ओलंपिक को स्वयं जाकर देखा।

इतना ही नहीं, 2012 के लंदन ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए उन्होंने बाकायदा छुट्टी ली और पूरे दौरे का खर्च अपनी जेब से उठाया। उन्होंने इस यात्रा के लिए सरकार से एक भी रुपये की सहायता नहीं ली।

युवा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना भी उनकी पहचान थी। कई उभरते क्रिकेटरों और युवाओं को उन्होंने अपने खर्च पर मुंबई और अन्य शहरों में आईपीएल तथा बड़े क्रिकेट मुकाबले दिखाने भेजा।

मेहमान आए तो बिना भोजन किए नहीं लौटते थे

डीवाई पाटिल की पहचान केवल शिक्षा और समाजसेवा तक सीमित नहीं थी। उनके संपर्क में आने वाले लोग उनकी बेहतरीन मेहमाननवाजी को भी हमेशा याद करते हैं।

कहा जाता है कि उनके घर या बंगले पर आने वाला कोई भी व्यक्ति बिना भोजन किए वापस नहीं लौटता था। वह स्वयं मेहमानों के साथ एक ही टेबल पर बैठकर भोजन करते, बातचीत करते और पूरे अपनत्व के साथ उनका स्वागत करते थे। यही सादगी और आत्मीयता उन्हें सबसे अलग बनाती थी।

गांव से शुरू हुआ सफर, देशभर में बनाई पहचान

कोल्हापुर जिले के अंबप गांव से शुरू हुआ डॉ. डीवाई पाटिल का सफर देशभर में शिक्षा के क्षेत्र में मिसाल बन गया। उन्होंने अनेक शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना कर लाखों विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा का अवसर दिया। शिक्षा, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने डीवाई पाटिल के निधन पर शोक जताते हुए 'एक्स' पोस्ट के जरिए कहा कि उनके निधन से महाराष्ट्र ने एक दूरदर्शी नेता, महान शिक्षाविद और उदार मार्गदर्शक खो दिया है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और पाटिल परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति दे। शिंदे ने कहा कि वह सिर्फ संस्थान बनाने तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने 'शैक्षणिक उत्कृष्टता' और 'संपूर्ण शिक्षा' के सिद्धांतों पर जोर देकर देश की उच्च शिक्षा को एक नई दिशा दी। डीवाई पाटिल यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, फार्मेसी, लॉ और आर्किटेक्चर समेत 16 से ज्यादा विषयों में 146 से अधिक कोर्स पढ़ाए जाते हैं। देश में सात स्वतंत्र यूनिवर्सिटी स्थापित करने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी उनके नाम है। कोल्हापुर, पुणे और नवी मुंबई में उनके द्वारा बनाए गए अस्पताल लाखों मरीजों के लिए वरदान साबित हुए। खेल के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। नवी मुंबई में उन्होंने अत्याधुनिक 'डीवाई पाटिल स्टेडियम' बनवाया जिसे दुनिया का 6वां सबसे बेहतरीन स्टेडियम माना जाता है।

डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा कि संस्थान बनाना आसान होता है लेकिन उसे अनुशासन, समर्पण और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ चलाना बहुत बड़ी चुनौती है। डॉ. डीवाई पाटिल ने यह काम सहजता से किया।

Updated on:
4 Aug 2026, 3:52 PM IST
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