
Shiv Sena UBT Crisis:उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) अब एक ऐसा डूबता जहाज बनती जा रही है, जिस पर कोई सवारी नहीं करना चाहता। 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत का ‘छेद’ किया था। उन्होंने न केवल शिवसेना तोड़ी बल्कि बाल ठाकरे की बनाई पार्टी का चुनाव चिन्ह भी उद्धव से छीन लाए।
उद्धव ने नए चुनाव चिन्ह ‘मशाल’ से पहचान बनाई। 2024 का लोकसभा चुनाव इसी नई पहचान पर लड़ा और उम्मीद से बेहतर परिणाम मिले। शिवसेना UBT के 9 सांसद चुनकर आए। हालांकि, इसके बाद विधानसभा चुनाव में उद्धव को घोर निराशा का सामना करना पड़ा। उनकी पार्टी महज 20 सीटों पर ही सिमट गई। नगर पालिका चुनावों में भी उद्धव के हाथ मायूसी ही लगी, जबकि राज ठाकरे उनके साथ मंच साझा कर रहे थे। यानी दोनों भाइयों ने गिले-शिकवे भुलाकर साथ चुनाव लड़ा था।
इतने झटके झेलने के बाद भी उद्धव ठाकरे और उनकी शिवसेना को बेहतर भविष्य की आस थी। लेकिन अब वो आस पूरी तरह टूटती नजर आ रही है। क्योंकि एकनाथ शिंदे 2026 में एक बार फिर से 2022 दोहराने को आतुर हैं। शिंदे ने उद्धव के 6 सांसदों को पाला बदलने पर राजी कर लिया है।
बात केवल इतनी भर नहीं है, वह उद्धव ठाकरे को पूरी तरह से अकेला करने का मन बना चुके हैं। शिवसेना UBT के करीब एक दर्जन विधायक और कई पार्षद भी एकनाथ शिंदे के संपर्क में बताए जा रहे हैं। 20 विधायकों वाली शिवसेना UBT के एक दर्जन विधायकों के टूटने का मतलब है, उद्धव ठाकरे की पार्टी का सफाया। इसके अलावा, उद्धव ठाकरे के कई युवा और वरिष्ठ नेता भी उनसे किनारा कर सकते हैं। शिवसेना UBT के तेज़ तर्रार प्रवक्ता आनंद दुबे को लेकर भी कुछ ऐसी चर्चा है। दुबे आदित्य ठाकरे के खास बताए जाते हैं। बीते कुछ समय में उन्हें कई टीबी डिबेट में सहयोगी पार्टियों की नीतियों पर सवाल खड़े करते देखा गया है। इससे कयास लगाए जा रहे हैं कि आनंद दुबे भी पाला बदलने की तैयारी में हैं। अब वह एकनाथ शिंदे के साथ जाते हैं या बीजेपी के, फिलहाल कहना मुश्किल है लेकिन उनका जाना आदित्य ठाकरे के लिए बड़ा झटका होगा।
अब एक बड़ा सवाल यह है कि क्या शिवसेना UBT के सांसद-विधायक केवल पैसों के लिए अपना ईमान बेच रहे हैं? नेता अवसरवादी होते हैं। जहां फायदा दिखता है, वहां पहुच जाते हैं। लेकिन शिवसेना UBT के मामले में बात केवल इतनी नहीं है। पार्टी संवाद और मेल-मिलाप के गंभीर संकट से गुजर रही है। तमाम नेता स्वीकारते हैं कि पार्टी प्रमुख से मिलना अब उतना आसान नहीं है, जितना बाला साहेब के जमाने में था। कई बाधाओं को पार करना पड़ता है और फिर भी कोई गारंटी नहीं होती कि बात उन तक पहुंचेगी ही।
उद्धव ठाकरे अपने कुछ चुनिंदा लोगों से ही घिरे रहते हैं और उनके अलावा किसी दूसरे की सुनना नहीं चाहते। इसके चलते नेताओं में उपेक्षा की भावना जन्म लेती है और ये उपेक्षा उन्हें पाला बदलने पर मजबूर कर देती है।
वहीं, बताया जा रहा है कि इसी स्थिति का फायदा उठाते हुए एकनाथ शिंदे आज भी समानता के भाव के साथ पार्टी चला रहे हैं। एक आम कार्यकर्ता के लिए भी उन तक पहुंचना आसान है। इसलिए शिवसेना के बागियों को उनका साथ सुहा रहा है।
एकनाथ शिंदे खुद भी उद्धव ठाकरे के साथ काम कर चुके हैं और शायद इस पीड़ा के साक्षी रहे हों। इसलिए वह शिवसेना UBT के उन नेताओं को सबसे पहले साधते हैं, जो इस दर्द से जूझ रहे हैं। और जब दो लोगों का दर्द एक जैसा होता है, तो एक नई कहानी की शुरुआत होती है। तो मोरल ऑफ द स्टोरी यह है कि अगर उद्धव को अपनी डूबती नैया बचानी है, तो उन्हें अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर आम कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ संवाद बढ़ाना होगा। अन्यथा एकनाथ शिंदे पूरी शिवसेना को निगल जाएंगे।