
एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे, फोटो सोर्स- IANS
Shiv Sena UBT Split: महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) के भीतर मची भगदड़ के पीछे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उनके सांसद बेटे श्रीकांत शिंदे की बेहद सधी हुई रणनीति थी। सूत्रों के अनुसार, जब संसद में परिसीमन विधेयक गिरा, तो एकनाथ शिंदे और श्रीकांत शिंदे ने इस मौके का फायदा उठाते हुए दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भरोसा दिलाया कि वे उद्धव गुट के सांसदों को अपने साथ जोड़कर एनडीए की ताकत बढ़ा सकते हैं।
अब सवाल ये था कि शिवसेना (यूबीटी) के पास कुल 9 ही सासंद थे, और एकनाथ शिंदे के सामने बड़ी चुनौती ये थी कि सासंदों को तोड़ने के साथ-साथ उन्हें दल-बदल विरोधी कानून से बचाना था, इसके लिए उन्हें कम से कम 6 सांसदों को अपने पाले में लाना था। उन्होंने मौके का फायदा उठाया और ठीक इसी आंकड़े को निशाना बनाते हुए शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों को अपने पाले में खींच लिया।
आपको बता दें कि 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत सबसे पहले उद्धव गुट के चार लोकसभा सांसदों नागेश पाटिल अष्टिकर, संजय जाधव, संजय देशमुख और भाऊसाहेब वाकचौरे से संपर्क साधा गया। इन चारों सांसदों के केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव के साथ बेहद अच्छे और दोस्ताना संबंध थे, जिसका फायदा शिंदे गुट को मिला। इसके अलावा, ये सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए फंड की कमी और उद्धव ठाकरे तक सीधी पहुंच (एक्सेस) न मिलने के कारण पहले से ही नाराज चल रहे थे।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, परभणी से सांसद संजय जाधव इस पूरी बगावत की पहली कड़ी बने। जाधव केंद्र में मंत्री पद की चाहत रखते हैं और वे इस साल दो बार पार्टी की बैठकों से गायब रहे थे। अप्रैल में जब वे एक बैठक में नहीं आए, तो गुस्से में उद्धव ठाकरे ने परभणी में उनके करीबी पदाधिकारियों को पदों से हटा दिया था। इस कार्रवाई के बाद संजय जाधव ने खुलकर बगावत की और बाकी सांसदों को जोड़ने में शिंदे की मदद की।
शिंदे को 4 सासंदो को अपने पाले में लाने के लिए कुछ ज्यादा जोर लगाने की जरूरत नहीं पड़ी थी, लेकिन बाकी के दो सांसदों को मनाना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। दरअसल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर शुरुआत में पाला बदलने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। लेकिन 2019 से 2022 के बीच जब एकनाथ शिंदे महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार में नगर विकास मंत्री थे, तब राजेनिंबालकर के साथ उनके बेहद मजबूत कामकाजी संबंध थे। शिंदे ने इसी पुराने रिश्ते का इस्तेमाल कर उन्हें आखिरकार मना लिया।
इतना ही नहीं पूर्व कांग्रेसी नेता संजय दीना पाटिल भी पाला बदलने को तैयार नहीं थे। लेकिन हाल ही में जब पाटिल की पत्नी पल्लवी का एक्सीडेंट हुआ, तो उद्धव गुट का कोई नेता उनसे मिलने नहीं पहुंचा, जबकि सीएम एकनाथ शिंदे खुद अस्पताल गए। इस भावुक कदम और अनौपचारिक बातचीत ने पाटिल का मन बदल दिया। उन्हें आश्वासन दिया गया है कि उनकी बेटी राजूल (जो यूबीटी की कॉर्पोरेटर हैं) को भविष्य में विधायक बनाया जा सकता है। हालांकि, पाटिल अभी भाजपा से अगले लोकसभा चुनाव के टिकट का ठोस आश्वासन चाहते हैं।
मंगलवार रात को एकनाथ शिंदे और श्रीकांत शिंदे के बीच आखिरी दौर की चर्चा के बाद, इन सभी चिन्हित सांसदों को अलग-अलग ठिकानों से निजी विमान के जरिए दिल्ली ले जाया गया। दिलचस्प बात यह है कि महाराष्ट्र भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता शिंदे के इस 'ऑपरेशन टाइगर' को लेकर थोड़े सतर्क थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इससे गठबंधन (महायुति) के भीतर शिंदे की राजनीतिक ताकत और मोलभाव (Equity) करने की क्षमता बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। हालांकि, भाजपा आलाकमान के निर्देश के कारण राज्य के नेताओं को भी इस पूरे प्लान को अपना समर्थन देना पड़ा।
Updated on:
19 Jun 2026 11:31 am
Published on:
19 Jun 2026 11:29 am
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