Maharashtra Politics: साल 2022 से खाली पड़ी पुणे की इस हाई-प्रोफाइल सीट को अपने पाले में बनाए रखने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) पूरा जोर लगा रही है। हालांकि, बदले हुए सियासी समीकरणों के बीच भाजपा इस सीट को अपना बनाना चाहती है।
निर्वाचन आयोग ने सोमवार को महाराष्ट्र विधान परिषद (MLC) की 16 सीटों पर 18 जून को चुनाव कराने की घोषणा की। जिस वजह से पुणे की एमएलसी सीट को लेकर सत्तारूढ़ महायुति के भीतर रस्साकशी शुरू हो गई है। 2022 से रिक्त पड़ी यह सीट दिवंगत नेता अजित पवार की एनसीपी के पास थी, लेकिन बदले हुए सियासी समीकरणों के बीच अब भाजपा (BJP) भी इस पर दावा ठोक रही है।
पूर्व विधायक अनिल भोसले की साल 2022 से खाली पड़ी इस हाई-प्रोफाइल सीट को अपने पाले में बनाए रखने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) पूरी ताकत झोंक रही है। उम्मीदवार का नाम फाइनल करने के लिए मंथन शुरू हो चुका है।
बता दें कि पुणे की यह सीट स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र की हैं। इसलिए पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ महानगरपालिका के नवनिर्वाचित नगरसेवक, जिला परिषद सदस्य और पंचायत समिति सदस्य मतदान करते हैं। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने यहां शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी संख्या में सीटें जीती हैं। जिसके चलते भाजपा अब इस सीट पर अपना दावा मजबूत मान रही है।
इसी वजह से अगले महिने होने वाले मतदान से पहले पुणे में मुकाबला सिर्फ महायुति बनाम महाविकास आघाड़ी (MVA) तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि महायुति के सहयोगी दलों के बीच ही अंदरूनी खींचतान तेज होने की चर्चा चल रही है।
भाजपा की तरफ से गणेश बीडकर का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। उन्हें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का करीबी माना जाता है और स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत समझी जाती है। इसके अलावा पूर्व विधायक जगदीश मुलिक भी मजबूत दावेदार हैं। बताया जाता है कि विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें विधान परिषद भेजने का आश्वासन पार्टी की ओर से दिया गया था।
वहीं, एनसीपी (सुनेत्रा पवार) की तरफ से पूर्व विधायक सुनील टिंगरे, पूर्व मेयर योगेश बहल और पूर्व सांसद संजय काकड़े के बेटे विक्रम काकड़े के नाम चर्चा में हैं। विक्रम काकड़े को सांसद पार्थ पवार का करीबी माना जाता है। ऐसे में सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच टकराव की संभावना बढ़ गई है।
वैसे तो पुणे (बारामती) में पवार परिवार की मजबूत पकड़ दशकों से है, लेकिन हालिया चुनावों को देखें तो भाजपा की ताकत जिले में तेजी से बढ़ी है। इसलिए संख्याबल का तर्क देकर यह सीट सहयोगी दल को छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही। दूसरी ओर सुनेत्रा पवार की अगुवाई वाला एनसीपी अजित पवार गुट भी इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के सामने भी पहला बड़ा राजनीतिक पेच खड़ा कर दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि महायुति नेतृत्व आखिर पुणे की इस सीट का समाधान कैसे करती है।