Breach Candy Club Mumbai Controversy: मुंबई के पॉश ब्रीच कैंडी क्लब में 2026 में भी केवल यूरोपीय नागरिकों को ही वोटिंग और मैनेजमेंट का अधिकार है। बॉम्बे हाईकोर्ट के पुराने आदेशों के बाद भी भारतीय सदस्यों को ट्रस्टी बनने का हक नहीं मिला है।
Breach Candy Club Shashi Tharoor: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के बेहद पॉश इलाके में स्थित ऐतिहासिक 'ब्रीच कैंडी क्लब' एक बार फिर अपनी विदेशी शासन के समय बनाए गए नियम-कानूनों का संग्रह और नस्लीय भेदभाव जैसी व्यवस्था को लेकर कानूनी और सामाजिक जांच के दायरे में आ गया है। जहां एक तरफ दिल्ली का प्रसिद्ध 'दिल्ली जिमखाना क्लब' सरकारी बेदखली के आदेशों और वीआईपी पात्रता के आरोपों से जूझ रहा है, वहीं मुंबई का यह क्लब 2026 में भी अपने उस अजीबोगरीब नियम को लेकर विवादों में है, जिसके तहत क्लब के प्रबंधन और असली फैसले लेने की ताकत केवल और केवल यूरोपियनों या यूरोपीय पासपोर्ट धारकों के पास ही सुरक्षित है। कांग्रेस नेता शशि थरूर को भी कभी अपने दरवाजे से वापस लौटाने के लिए चर्चा में रहे इस क्लब की दोहरी सदस्यता प्रणाली अब सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में 'काले अंग्रेजों' के दौर और नस्लीय भेदभाव के रूप में देखी जा रही है।
इंडिया टूडे की रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण मुंबई की आलीशान भूलाभाई देसाई रोड पर अरब सागर के ठीक सामने करीब 4 एकड़ के प्राइम लैंड पर फैला यह क्लब साल 1878 में अंग्रेजों द्वारा केवल यूरोपीय निवासियों के मनोरंजन के लिए शुरू किया गया था। भारत की आजादी के बाद, भारी सार्वजनिक दबाव के चलते 1960 के दशक में भारतीयों को साधारण सदस्यता देना तो शुरू किया गया, लेकिन इसके मूल सत्ता ढांचे का कभी लोकतंत्रीकरण नहीं हुआ।
साल 1967 में सिटी सिविल कोर्ट द्वारा अनुमोदित इस ट्रस्ट के संविधान के अनुसार सदस्यों को दो भागों में बांटा गया है-
आपको बता दें कि इस क्लब की भव्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी सदस्यता की फीस करीब 1.2 करोड़ रुपए से लेकर कई करोड़ रुपए तक जाती है और इसके बाद भी सदस्यता पाने के लिए एक दशक (10 साल) से ज्यादा का इंतजार करना पड़ता है। इतना ही नहीं इस क्लब की सबसे खास पहचान इसका विशाल आउटडोर खारे पानी का स्विमिंग पूल है, जो हूबहू 'अखंड ब्रिटिश भारत' के नक्शे के आकार में बना हुआ है। हालांकि, मुंबई के कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के कारण अब इसके ठीक सामने की समुद्री लहरों का किनारा थोड़ा पीछे चला गया है, लेकिन आज भी इस व्यस्त महानगर के वीआईपी और संभ्रांत तबके के लिए यह क्लब दुनिया की भागदौड़ से दूर रहने का एक लग्जरी ठिकाना है।
इस दोहरी और कथित तौर पर भेदभावपूर्ण व्यवस्था को भारतीय सदस्यों द्वारा कई बार बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन हर बार कानूनी जीत यूरोपियनों की ही हुई है। 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एस.सी. गुप्ते ने अपने फैसले में क्लब के संविधान का हवाला देते हुए 'यूरोपियनों-ओनली' के नियम को अपरिहार्य ( जिले टाला न जा सके ) बताया था और उस मैनेजिंग कमेटी को भंग कर दिया था जिसमें भारतीय सदस्य शामिल हो गए थे। वहीं, 2022 के फैसले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने फिर से इसी स्थिति को दोहराया और भारतीय मूल के तदर्थ (Ad-hoc) कमेटी के सदस्यों को पद छोड़ने का आदेश दिया।
न्यायालयों का तर्क है कि चूंकि यह 'महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट' के तहत पंजीकृत एक निजी धर्मार्थ ट्रस्ट है, इसलिए इसके मूल संस्थापक दस्तावेजों और ऐतिहासिक अनुबंधों की पवित्रता को बदला नहीं जा सकता, जब तक कि संसद कोई नया कानून न बनाए या सुप्रीम कोर्ट इस पर हस्तक्षेप न करे।