
Kapil Sibal Shiv Sena Supreme Court: महाराष्ट्र में वर्ष 2022 में हुए राजनीतिक घटनाक्रम और शिवसेना के नाम व आधिकारिक चुनाव चिह्न 'धनुष-बाण' को लेकर जारी कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट के भीतर गुरुवार को जोरदार बहस हुई। पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में बेहद आक्रामक रुख अपनाया। सिब्बल ने मुख्य रूप से यह बात रखी कि यदि बगावत के शुरुआती दौर में ही मामले पर त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई हो जाती, तो समय पर सुनवाई होती तो एकनाथ शिंदे नहीं बनते सीएम। उन्होंने शीर्ष अदालत से इस पूरे विवाद में बिना किसी देरी के अंतिम निर्णय देने की अपील की।
अदालत के समक्ष दलीलें पेश करते हुए कपिल सिब्बल ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर द्वारा लिए गए निर्णयों की प्रक्रियात्मक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने कहा कि केवल 31 विधायकों की संख्या वाला एक समूह पूरी मूल राजनीतिक पार्टी होने का दावा नहीं कर सकता। इन्हीं असंतुष्ट विधायकों ने मिलकर तत्कालीन मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) सुनील प्रभु को हटाकर भरत गोगावले को नया व्हिप घोषित कर दिया, जिसे बाद में असंवैधानिक रूप से स्वीकार कर लिया गया। उन्होंने प्रसिद्ध 'सुभाष देसाई मामले' के कानूनी सिद्धांतों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि किसी विधायी दल (Legislative Party) के पास केवल विधायकों की संख्या होना, उसे मूल राजनीतिक दल मानने का अधिकार नहीं देता।
संविधान की दसवीं अनुसूची और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए सिब्बल ने कहा कि कोई भी जनप्रतिनिधि जिस दल के चुनाव चिह्न और विचारधारा पर जनता का जनादेश हासिल करता है, उसे उसी दल के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि चुनाव जीतने के उपरांत व्यक्तिगत लाभ के लिए दूसरा खेमा चुन लेना एक प्रकार की 'संवैधानिक आत्महत्या' है, जो भारत के संसदीय लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।
कपिल सिब्बल ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका को भी अनुचित ठहराया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने वर्ष 2018 में संशोधित शिवसेना के संविधान के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए केवल विधायकों और सांसदों की संख्या बल को आधार बनाया। इसी आधार पर शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चिह्न आवंटित कर दिया गया, जो प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से त्रुटिपूर्ण था।