महाराष्ट्र में जहां भाजपा अधिकांश महानगरपालिकाओं में क्लीन स्वीप करती दिख रही है, वहीं वसई-विरार में तस्वीर बिल्कुल उलट रही। यहां हितेंद्र ठाकुर की अगुवाई वाली बहुजन विकास आघाडी ने भाजपा की तमाम रणनीतियों को नाकाम कर दिया।
जहां पूरे महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की लहर दिखाई दे रही है, वहीं मुंबई के करीब पालघर जिले के वसई-विरार में एक अलग ही सियासी कहानी लिखी गई है। यहां न तो भाजपा की रणनीति काम आई और न ही बड़े दलों का प्रभाव, यहां केवल 'सीटी' बजी। स्थानीय दिग्गज नेता हितेंद्र ठाकुर की पार्टी बहुजन विकास आघाडी (BVA) ने प्रचंड बहुमत हासिल करते हुए एक बार फिर अपना अभेद्य किला फतह कर लिया है।
वसई-विरार महानगरपालिका (नगर निगम) की 115 सीटों के लिए हुई मतगणना के परिणामों ने सबको चौंका दिया है। सत्ता के लिए जादुई आंकड़ा 58 था, जिसे पार करते हुए हितेंद्र ठाकुर की बहुजन विकास आघाडी ने 71 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की। जहां 'सीटी' चुनाव चिन्ह वाली बीवीए को स्पष्ट बहुमत मिला, वहीं भाजपा 43 सीटों पर सिमट गई। इसके अलावा शिवसेना (एकनाथ शिंदे) की झोली में एक सीट आई और कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, एनसीपी समेत अन्य सभी दलों का सूपड़ा साफ हो गया। आज की जीत के साथ वसई-विरार महानगरपालिका पर बहुजन विकास आघाड़ी की सत्ता बरकरार रही है।
हितेंद्र ठाकुर महाराष्ट्र की सियासत में खासकर पालघर और वसई-विरार क्षेत्र के 'किंगमेकर' माने जाते हैं। उन्होंने साल 2009 में अपनी पार्टी बहुजन विकास अघाड़ी (BVA) बनाई।
महाराष्ट्र की 20 से ज्यादा महानगरपालिकाओं में जीत के करीब पहुंची भाजपा के लिए वसई-विरार का नतीजा एक बड़े झटके की तरह है। यहां भाजपा की सारी रणनीतियां फेल साबित हुईं और पार्टी 43 सीटों पर ही सिमट गई। सबसे बुरा हाल कांग्रेस, एनसीपी दोनों गुट और उद्धव ठाकरे की शिवसेना का रहा जो खाता भी न खोल सकी।
हितेंद्र ठाकुर वसई-विरार और नालासोपारा क्षेत्र में लंबे समय से एक मजबूत राजनीतिक चेहरा माने जाते हैं। उन्होंने 2009 में बहुजन विकास आघाड़ी (BVA) की स्थापना की थी और वसई विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक रह चुके हैं। उनके बेटे क्षितिज ठाकुर फिलहाल नालासोपारा से विधायक हैं। स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित राजनीति और क्षेत्रीय पकड़ ही BVA की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, जिसके कारण राज्य की बड़ी पार्टियां भी उनके क्षेत्र में पैर जमाने में नाकाम रहती हैं।