
Gulab Kothari Muzaffarnagar Stree Deh Se Aage Dialogue: स्त्री को केवल शरीर, रिश्तों या सामाजिक भूमिकाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वह स्वतंत्र चेतना, विचार और संवेदना से पूर्ण मनुष्य है। परिवार से लेकर समाज और आने वाली पीढ़ियों के संस्कार निर्माण में उसकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और सामाजिक सोच में स्त्री के जीवन, उसकी आत्मिक शक्ति और उसके निर्णय के अधिकार को भी उतना ही महत्व दिया जाए।
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने गुरुवार को मुजफ्फरनगर पुलिस लाइन स्थित सभा स्थल पर आयोजित ‘स्त्री : देह से आगे’ संवाद कार्यक्रम में यह बात कही। उन्होंने कहा कि समाज में महिला के साथ भेदभाव, अवसरों की असमानता और विभिन्न प्रकार की चुनौतियों पर चर्चा होती रही है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि स्त्री को उसके संपूर्ण स्वरूप में कब समझा जाएगा। शरीर जीवन का केवल एक माध्यम है, जबकि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी चेतना और संस्कारों से बनती है।
कार्यक्रम की शुरुआत शिक्षाविद डॉ. नीलम राय के संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि सामान्यतः स्त्री का नाम आते ही हमारे सामने बेटी, बहन, पत्नी, बहू या मां जैसे रिश्तों की छवि आती है। लेकिन इन रिश्तों से आगे भी उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व है। उन्होंने कहा कि स्त्री को स्वयं भी यह चेतना रखनी होगी कि वह स्वतंत्र विचार और निर्णय क्षमता रखने वाली नागरिक है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को सबसे पहले स्वयं अपना सम्मान करना सीखना चाहिए। केवल चेहरे की सुंदरता को स्त्री की पहचान मानना उचित नहीं है। चेहरे पर संघर्ष के निशान भी हों तो वे उसके जीवन की कहानी कह सकते हैं। बच्चों को भी केवल सुंदर दिखने की सीख देने के बजाय स्वतंत्र विचार रखने, अपनी बात कहने और निर्णय लेने का आत्मविश्वास देना जरूरी है।
राय ने कहा कि भारतीय परंपरा में गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, मीरा, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य महिलाओं के उदाहरण बताते हैं कि प्रश्न उठाने और अपने विचार रखने वाली स्त्रियों ने समाज को नई दिशा दी। उन्होंने कहा कि जिस दिन परिवार में बेटी के विचार को भी बेटे के विचार के बराबर महत्व मिलेगा, उसी दिन वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।
उन्होंने ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्त्वमसि’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि जब मूल चेतना एक है तो स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव का आधार नहीं रह जाता। समाज की कुछ रूढ़ धारणाएं ऐसी हैं, जिन्हें बदलने के लिए सोच में परिवर्तन आवश्यक है। उन्होंने गृहिणी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि घर संभालना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी और प्रबंधन क्षमता का परिचायक है।
कार्यक्रम के अंत में आयोजक पुलिस अधीक्षक (क्राइम) इंदु सिद्धार्थ ने कोठारी, डॉ. राय सहित उपस्थित अधिकारियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर कोठारी की पुस्तक ‘स्त्री : देह से आगे’ भी उपस्थित अतिथियों को भेंट की गई।
मुख्य वक्ता गुलाब कोठारी ने कहा कि आज महिला शिक्षा और सशक्तीकरण की बात व्यापक स्तर पर हो रही है, लेकिन शिक्षा के मौजूदा स्वरूप में स्त्री के जीवन और उसकी विशिष्ट भूमिका से जुड़े प्रश्न पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति में स्त्री और पुरुष अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन सृष्टि की मूल चेतना के स्तर पर दोनों के भीतर एक ही तत्व विद्यमान है।
उन्होंने अर्धनारीश्वर की अवधारणा के माध्यम से स्त्री-पुरुष की परस्पर पूरकता समझाई। उनके अनुसार सृष्टि में ऊर्जा के विभिन्न रूप दिखाई देते हैं, लेकिन उनके मूल में एक ही तत्व है। इसलिए स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी या विरोधी रूप में देखने के बजाय जीवन की समग्र व्यवस्था में दोनों की भूमिकाओं को समझना चाहिए।
कोठारी ने कहा कि ‘पुरुष प्रधान समाज’ जैसी अवधारणा को भी गहराई से समझने की जरूरत है। उनके अनुसार भारतीय दर्शन में ‘पुरुष’ का अर्थ केवल पुरुष शरीर वाला मनुष्य नहीं, बल्कि व्यापक चेतना से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि जन्म, पालन-पोषण, संस्कार और जीवन के निर्माण में प्रकृति और माया की भूमिका को समझे बिना स्त्री की वास्तविक शक्ति को नहीं समझा जा सकता।
कोठारी ने कहा कि समाज में स्त्री-पुरुष के व्यवहार में अंतर की शुरुआत परिवार से ही होती है। लड़के को अक्सर अधिक स्वतंत्रता दी जाती है, जबकि लड़की को बचपन से ही सामाजिक मर्यादाओं और जिम्मेदारियों का पाठ पढ़ाया जाता है। परिणामस्वरूप लड़के के भीतर करुणा, संवेदना, ममता और संयम जैसे गुणों के विकास पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना लड़की की परवरिश में स्वाभाविक रूप से होता है।
उन्होंने कहा कि अर्धनारीश्वर की अवधारणा को समझें तो हर पुरुष के भीतर भी स्त्री के गुण और हर स्त्री के भीतर पुरुष के गुण मौजूद हैं। इसलिए दोनों के व्यक्तित्व के संतुलित विकास पर ध्यान देना जरूरी है।
कोठारी ने कहा कि आधुनिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा शरीर, रोजगार और भौतिक उपलब्धियों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाना भी होना चाहिए। भारतीय चिंतन में शरीर और आत्मा दोनों को साथ लेकर जीवन को समझने की परंपरा रही है। लेकिन आधुनिक शिक्षा में आत्मा, संस्कार, संवेदना और जीवन के गहरे अर्थ से जुड़े प्रश्नों को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। इससे शिक्षा और जीवन के बीच दूरी पैदा हुई है।
उन्होंने कहा कि समाज में बदलाव लाने के लिए आने वाली पीढ़ी की शिक्षा में भौतिक ज्ञान के साथ आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष को भी जोड़ना होगा। जब तक शरीर के साथ चेतना और संस्कारों को नहीं समझा जाएगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा।
कोठारी ने गर्भावस्था और मातृत्व की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मां की भूमिका बच्चे के जन्म के बाद शुरू नहीं होती। गर्भ में आने वाले बच्चे के निर्माण की प्रक्रिया में भी मां की भूमिका महत्वपूर्ण है। उसके खान-पान, भावनाओं और मानसिक स्थिति का प्रभाव उसके माध्यम से बच्चे तक पहुंचता है।
उन्होंने कहा कि मां के पास ऐसी संवेदनात्मक क्षमता होती है, जिसके माध्यम से वह बच्चे के भीतर विकसित हो रहे बदलावों को महसूस करती है। जन्म के बाद भी मां केवल बच्चे का पालन नहीं करती, बल्कि उसके संस्कारों और व्यवहार को आकार देती है। किसी समाज का वास्तविक निर्माण स्कूल, कॉलेज या संस्थानों से पहले परिवार में होता है। मां बच्चे को भाषा, व्यवहार, संवेदना, परिवार की परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से परिचित कराती है। इसलिए मातृत्व को केवल जैविक भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि समाज निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में समझने की जरूरत है।
कोठारी ने भारतीय परंपरा में अन्न के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि अन्न केवल शरीर का पोषण करने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में इसे जीवन और संस्कार से भी जोड़ा गया है।
उन्होंने कहा कि घर में भोजन बनाने की परंपरा केवल खाना तैयार करने की प्रक्रिया नहीं थी। भोजन के माध्यम से परिवार के सदस्यों के प्रति भावनाएं और संस्कार भी पहुंचते थे। आधुनिक जीवनशैली में जब घर के भोजन और पारिवारिक संवाद की परंपराएं कमजोर हो रही हैं, तब इसके सामाजिक प्रभावों को भी समझना जरूरी है।
कोठारी ने कहा कि पिछली पीढ़ियों ने क्या गलतियां कीं, इस पर बहस करते रहने के बजाय अब यह तय करने की जरूरत है कि आने वाली पीढ़ी को कैसा समाज देना है। उन्होंने कहा कि शरीर के विकास के साथ आत्मिक और मानवीय गुणों का विकास भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और देश के निर्माण में महिलाओं की भूमिका को समझना होगा। यदि संस्कार, संवेदना और मानवीय मूल्यों को मजबूत किया जाएगा तो आने वाली पीढ़ी अधिक संतुलित समाज का निर्माण कर सकेगी।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. नीलम राय ने कोठारी के संबोधन को प्रेरक बताते हुए कहा कि ऐसे संवाद से सोचने का नया दृष्टिकोण मिलता है। उन्होंने कहा कि वह ‘स्त्री : देह से आगे’ पुस्तक का अध्ययन करेंगी और भविष्य में भी कोठारी से संवाद बनाए रखना चाहेंगी।
कार्यक्रम में महिला पुलिसकर्मी, प्रशिक्षु अधिकारी, पुलिस अधिकारी और अन्य महिलाएं मौजूद रहीं। संबोधन के बाद प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें महिलाओं ने गर्भ संस्कार, स्त्री की भूमिका और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े सवाल पूछे। कोठारी ने प्रश्न करने और स्वाध्याय को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की बात कही।
प्रश्न करने वाली स्त्री समाज को नई दिशा देती है। कार्यक्रम में स्त्री शक्ति के संदर्भ में भारतीय इतिहास और परंपरा की अनेक महिलाओं के उदाहरण सामने आए। गार्गी ने दर्शन की सभा में अस्तित्व और ब्रह्म को लेकर प्रश्न उठाए। मैत्रेयी ने भौतिक संपदा के बजाय सत्य की खोज को महत्व दिया। मीरा ने अपने विश्वास और स्वतंत्र चेतना के लिए राजमहल की सीमाओं से बाहर जाने का निर्णय लिया। रानी लक्ष्मीबाई ने संघर्ष के दौर में महिलाओं को संगठित और प्रशिक्षित किया। द्रौपदी ने भरी सभा में सवाल उठाकर उस समय की सामाजिक और नैतिक व्यवस्था के सामने प्रश्न खड़ा किया। संदेश यही रहा कि स्त्री की पहचान केवल उसके शरीर या रिश्तों से नहीं, बल्कि उसके विचार, प्रश्न, निर्णय और चेतना से होती है।
शरीर से आगे चेतना…
मनुष्य की पहचान केवल शरीर से नहीं, उसकी चेतना और संस्कारों से होती है।
परिवार से समाज निर्माण…
समाज का मूल निर्माण परिवार में होता है और इसमें मां की भूमिका केंद्रीय है।
शिक्षा का व्यापक अर्थ…
शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बेहतर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया भी होनी चाहिए।
संतुलित परवरिश…
दोनों के भीतर संवेदना, करुणा, संयम और जिम्मेदारी जैसे गुण विकसित किए जाने चाहिए।
मातृत्व की भूमिका…
बच्चे के जन्म से पहले और बाद में मां की भूमिका उसके शारीरिक विकास के साथ संस्कार निर्माण से भी जुड़ी है।
अतीत नहीं, भविष्य पर ध्यान…
पिछली पीढ़ियों की गलतियों पर रुकने के बजाय आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर समाज बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
प्रश्न और स्वाध्याय…
जीवन को समझने के लिए प्रश्न पूछना और निरंतर अध्ययन करना आवश्यक है।