
नागौर. शहर में लीकेज से रोजाना हजारों-लाखों लीटर अमृत व्यर्थ बह रहा है। अकेले कॉलेज रोड पर मानासर से मूण्डवा चौराहा तक की पेयजलापूर्ति लाइन में एक दर्जन से ज्यादा छोटे-बड़े लीकेज है। जलदाय विभाग कार्यालय के सामने बड़े लीकेज के कारण सडक़ के पास तालाब सा बना हुआ है, लेकिन रोजाना इधर से गुजरने वाले जिम्मेदारों की नजर भी इन लीकेजों पर नहीं पड़ती। विभाग कभी पानी की कमी तो कभी प्रेशर की समस्या बता महज पन्द्रह से बीस मिनट पानी देता है, वहीं लाखों लीटर पानी ऐसे ही बह जाता है।
लीकेज के नाम पर खानापूर्ति :
नगर परिषद की शहरी जल प्रदाय योजना में लीकेज ठीक करने के लिए ठेका दिया जाता है। ठेकेदार के आदमी लीकेज ठीक करने के नाम पर महज खाना पूर्ति करते हैं। लीकेज वाले स्थान पर नियमानुसार नट बोल्ट लगाने के बजाय साईकिल के पुराने ट्यूब लपेटकर औपचारिकता की जाती है। कुछ समय बाद पानी की लाइन पर ऊपर से दबाव पडऩे तो कभी पानी के प्रेशर के कारण उस जगह पर फिर से लीकेज हो जाता है। अधिकारी भी बिना भौतिक सत्यापन किए ठेकेदारों को लाखों रुपए का भुगतान कर देते हैं।
लाखों खर्च नतीजा शून्य
शहर में प्रतिमाह पांच सौ लीकेज पर डेढ से दो लाख रुपए के हिसाब से साल भर में 20 से 25 लाख रुपए खर्च होते हैं। पाइप, ज्वाइंट व अन्य सामग्री को मिलाकर सालाना करीब 30 लाख रुपए केवल लीकेज सुधार पर खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद शहर में लीकेज की स्थिति जस की तस है। आज यहां तो कल वहां की तर्ज पर शहर की पेयजलापूर्ति लाइन से पानी व्यर्थ बहता रहता है। ऐसे में प्रति व्यक्ति तीस से पचास लीटर शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं हो पाता।
ठीक करवाते हैं
पेयजलापूर्ति लाइनों के लीकेज निकालने की अलग-अलग दर निर्धारित है। समय-समय पर लीकेज ठीक करवाते हैं। अगर कहीं लीकेज से पानी व्यर्थ बह रहा है तो ठीक करवाएंगे।
दिनेश शर्मा , एईएन, शहरी जलप्रदाय योजना, नगर परिषद नागौर