नागौर

‘आदर्शवादी विचार और व्यावहारिक जीवन के बीच समन्वय हो स्थापित’

लाडनूं. भगवान महावीर अन्तर्राष्ट्रीय शोध केन्द्र के तत्वावधान में सेमीनार हॉल में शुक्रवार से दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुई।
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Updated: 23 Feb 2018, 6:21 PM IST
Ladnun news
लाडनूं. कस्बे स्थित जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय में शुक्रवार से शुरू हुई कार्यशाला को सम्बोधित करते प्रो. एसआर व्यास तथा मंचस्थ अन्य अतिथि।

लाडनूं. जैन विश्व भारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के जैन विधा एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग एवं भगवान महावीर अन्तर्राष्ट्रीय शोध केन्द्र के तत्वावधान में सेमीनार हॉल में शुक्रवार से दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुई। बेहतर भविष्य के लिए जैन संस्थाओं से जुड़ाव व लगाव विषयक कार्यशाला के मुख्य अतिथि मोहनलाल सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय उदयपुर के प्रो. एसआर व्यास ने कहा कि अनेक संस्थाएं एक ही क्षेत्र में काम करती है तो उनके काम में डुप्लीकेसी होना संभव है। इससे बचने और अपनी शक्ति को अधिक बेहतर बनाने के लिए परस्पर समन्वय स्थापित करना आवश्यक है। आज सहकारिता का युग है। परस्पर सहयोग होना आवश्यक है। जैन दर्शन में एक ही विषय पर शोध का काम अलग-अलग संस्थाओं द्वारा करने के बजाय अलग-अलग कामों को आपसी सहयोग से करने से जैन दर्शन का विस्तार संभव होगा। उन्होंने कहा कि हर कार्य विचार से शुरू होता है और फिर वो आचार में आता है। इसके बाद उसका संचार होना चाहिए और तत्पश्चात उसका प्रचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को करने से पहले उस कार्य की जानकारी, उसकी प्रकृति, कर्ता की योग्यता और कर्म का उद्देश्य स्पष्ट होने चाहिए। समाज की नब्ज को टटोलें और जानें कि आम आदमी क्या चाहता है। आज आवश्यक है कि आदर्शवादी विचारों और व्यावहारिक सामाजिक जीवन के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि भारतीय संस्थाओं के विकास में परस्पर नेटवर्किंग व सहयोग का अवरोध है, जिसे एक चैन स्थापित करके दूर किया जा सकता है। उन्होंने जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा जैन विद्या क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों, रिसर्च सेंटर, समर स्कूल आदि के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि संस्थाओं के बीच नेटवर्किंग स्थापित करें और जानें कि वे क्या-क्या काम कर रही हैं। उनके काम में कहीं पुनरावृति नहीं हो और काम में परस्पर जानकारी का सहयोग हो। ऐसे सहयोग के अनेक पहलु हो सकते हैं। हमें सभी संस्थाओं का समन्वित विकास हो इस पर चिन्तन करना है। जैन विधा एवं तुलनात्मक धर्म व दर्शन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. समणी ऋज़ुप्रज्ञा ने कहा कि जैन दर्शन को समझने के लिए आज युवा पीढी तत्पर है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि जैन दर्शन को उनकी भाषा में पहुंचाया जावे। जैन सिद्धांतों से युगीन समस्याओं के समाधान को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन धर्म आज भी प्रासंगिक है और यह सबसे वैज्ञानिक धर्म है। नए प्रश्नों और समस्याओं पर चिंतन आवश्यक है, अन्यथा नई पीढी श्रद्धाशील नहीं रह पाएगी। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों में काम कर रही जैन संस्थाओं से जुड़े विशेषज्ञों को बुलाया गया है। ताकि सभी संस्थाओं के बीच नेटवर्किंग, कनेक्टिंग और परस्पर सहयोग बन सके। कार्यक्रम का शुभारम्भ समणी प्रणव प्रज्ञा के मंगलाचरण से किया गया। डा. गोविन्द सारस्वत ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डा. योगेश कुमार जैन ने किया। कार्यशाला में देश भर से आए जैन विधा क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।

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