Eco corridor: राष्ट्रीय राजमार्ग अब केवल तेज रफ्तार और कंक्रीट की पहचान ही नहीं, जैव विविधता संरक्षण की नई पहल के केंद्र बनाने की तैयारी की जा रही है।
नागौर। राष्ट्रीय राजमार्ग अब केवल तेज रफ्तार और कंक्रीट की पहचान ही नहीं, जैव विविधता संरक्षण की नई पहल के केंद्र बनाने की तैयारी की जा रही है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे मधुमक्खी-अनुकूल हरित पट्टियां विकसित करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है। यह पहल विकास और पर्यावरण के संतुलन को साधने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।
एनएचएआई ने इस पहल को देश में हाईवे पर अपनी तरह का पहला ‘मधुमक्खी गलियारा’ बताया है जो सजावटी से पारिस्थितिक वृक्षारोपण के बदलाव को दिखाएगा। दरअसल, हाल के वर्षों में मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ता कीटों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है।
बदलती जलवायु, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और घटते हरित क्षेत्र इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं। इसका सीधा असर कृषि और बागवानी उत्पादन पर पड़ा है, क्योंकि फसलों का बड़ा हिस्सा परागण पर निर्भर करता है। ऐसे में राजमार्गों के किनारे उपलब्ध भूमि को परागणकर्ताओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास में बदलने की योजना तैयार की गई है।
योजना के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे 500 मीटर से एक किलोमीटर के अंतराल पर फूलदार पेड़-पौधों के समूह लगाए जाएंगे। यह दूरी मधुमक्खियों और जंगली मधुमक्खियों की औसत चारा खोजने की सीमा को ध्यान में रखकर तय की गई है। इन हरित पट्टियों में नीम, करंज, महुआ, पलाश, जामुन, सिरिस और बॉटल ब्रश जैसी देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही झाडिय़ां, जड़ी-बूटियां और घास का मिश्रण भी शामिल होगा। जिससे सालभर अलग-अलग मौसम में फूल खिलने के साथ मकरंद व पराग की निरंतर उपलब्धता बनी रहे।
स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्रीय राजमार्ग और एनएचएआई के खाली भूखंडों पर मधुमक्खी गलियारे विकसित किए जाएंगे। प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय तीन ऐसे गलियारे के लिए हाइवे चयनित करके 2026-27 के दौरान विकसित करेगा। इसके अतिरिक्त लकड़ी और खोखले तनों जैसी प्राकृतिक संरचनाएं भी विकसित की जाएंगी, जो परागण कीटों के लिए आश्रय का काम करेंगी।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर वर्ष 2026-27 के दौरान लगभग 40 लाख पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है। जिनमें से करीब 60 प्रतिशत इस विशेष पहल के तहत होंगे। क्षेत्रीय कार्यालयों को ऐसे तीन-तीन विशेष मधुमक्खी गलियारों की पहचान और विकास की जिम्मेदारी दी गई है।