19 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पीएचईडी के भ्रष्ट अधिकारियों के कर्मों की सजा भुगत रहा है नागौर

पहले नहरी प्रोजेक्ट में तथा बाद में जेजेएम में किया फर्जीवाड़ा, जिसके चलते आज तक गांव-ढाणियों में नहीं पहुंच पाया पानी, जेजेएम में भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कई आरोपी अधिकारी लम्बे समय तक रहे नागौर जिले में, एसीबी करे नागौर के कार्यकाल की जांच तो खुल सकती हैं कई भ्रष्टाचार की परतें

3 min read
Google source verification
गर्मी के दिनों में गोगेलाव डेम पर लगती है टैंकरों की लाइन

गर्मी के दिनों में गोगेलाव डेम पर लगती है टैंकरों की लाइन

नागौर. राजस्थान में जल जीवन मिशन (जेजेएम) से जुड़े हजारों करोड़ रुपए के कथित घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की कार्रवाई ने एक बार फिर नागौर जिले के पुराने जख्म हरे कर दिए हैं। जेजेएम घोटाले में जिन अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें से कई लंबे समय तक नागौर में पदस्थ रहे और नहरी परियोजना में धरातल पर काम करने की बजाए कागजों में काम बताकर भुगतान उठा लिया। जिसका खमियाजा आज भी जिले के लाखों लोग पानी की किल्लत के रूप में भुगत रहे हैं। पिछले 15-20 सालों में सरकारें बदलीं, दावे और डेडलाइन बदलीं, लेकिन हालात नहीं सुधरे। कई गांवों में कागजों में पानी पहुंचा दिया गया, जबकि धरातल पर पाइपलाइन अधूरी या अनुपयोगी पड़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऊंचाई वाले गांवों में पर्याप्त प्रेशर की व्यवस्था नहीं की गई, फिर भी पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी कर दिए गए।

सोमवार को हुई एसीबी की कार्रवाई में जिन अधिकारियों के नाम चर्चा में हैं, उनमें तत्कालीन चीफ इंजीनियर दिनेश गोयल व मुकेश गोयल एवं तत्कालीन एसई सुभांशु दीक्षित व महेन्द्र सोनी शामिल हैं। इनमें से तीन की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि एक फरार है। यदि एसीबी इन अधिकारियों के नागौर कार्यकाल की गहराई से जांच करे तो नहरी परियोजना से जुड़ी भ्रष्टाचार की कई और परतें खुल सकती हैं।

4500 करोड़ खर्च, फिर भी प्यासा नागौर

पिछले करीब 20 वर्षों में नागौर (डीडवाना-कुचामन सहित) में इंदिरा गांधी नहरी परियोजना के प्रथम व द्वितीय चरण पर लगभग 4200 करोड़ रुपए खर्च किए गए। पहले चरण में 1194.03 करोड़ रुपए खर्च किए गए तथा दूसरे चरण में 2938 करोड़ रुपए के कार्य बताकर जिले के 12 कस्बों और 1480 गांवों में पानी पहुंचाने का दावा किया गया, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और थी। इसके बाद जेजेएम के तहत 1190.13 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। जिले में वर्ष 2011 की जनगणना अनुसार कुल 1589 ग्राम हैं। इन सभी ग्रामों को वर्ष 2024 तक जेजेएम के तहत घर-घर जल कनेक्शन से लाभान्वित कर 55 लीटर की दर से प्रत्येक ग्रामीण व्यक्ति को शुद्ध पेयजल उपलब्ध करवाना था। कुल मिलाकर अब तक 4500 करोड़ से अधिक राशि खर्च होने के बावजूद जिला मुख्यालय से लेकर गांव-ढाणियों तक लोग आज भी हिमालय के मीठे पानी को तरस रहे हैं।

फ्लोराइड जांच का बजट ही खर्च नहीं होने दिया

नागौर फ्लोराइड प्रभावित जिलों में शामिल है। मीठा नहरी पानी नहीं मिलने से ग्रामीण आज भी फ्लोराइड युक्त भूजल पीने को विवश हैं, जिससे दांत व हड्डियों की बीमारियां बढ़ रही हैं। नहरी परियोजना के दूसरे चरण के लिए जापान (जायका) से 2938 करोड़ रुपए उधार लिए गए। जिसमें जापान ने करीब 20 करोड़ रुपए का प्रावधान फ्लोराइड जांच एवं जनजागरूकता के लिए किया, लेकिन तत्कालीन अधिकारियों ने अधीनस्थ अधिकारियों की ओर से तैयार किए गए प्रस्ताव को मंजूरी ही नहीं दी। इसको लेकर जापानी इंजीनियर्स ने नाराजगी भी जाहिर की थी।

जेजेएम में भी दोहराई जा रही पुरानी गलतियां?

वर्ष 2019 में केंद्र सरकार की ओर से शुरू किए गए जल जीवन मिशन के तहत नागौर में 1857.67 करोड़ रुपए तक के कार्यों की घोषणा हुई। नहरी परियोजना में जिन गांवों में पानी पहुंचाने का दावा किया गया, जेजेएम में उन्हीं को शामिल कर नई स्वीकृतियां दी गईं। वजह यह थी कि वास्तव में कई गांवों में पानी पहुंच नहीं पाया। आज भी जेजेएम के छह साल बीतने के बावजूद आज भी कई गांव प्यासे हैं। हालांकि जिले में जेजेएम कार्यों को कई पैकेज में बांटा गया, लेकिन प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हो रही है। लक्ष्य के मुकाबले आधे से भी कम कनेक्शन जारी हो पाए हैं।

एसीबी जांच से खुल सकती हैं परतें

विभागीय सूत्रों व विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एसीबी नागौर में रहे अधिकारियों के कार्यकाल की फाइलें, टेंडर प्रक्रिया, भुगतान और साइट निरीक्षण रिपोर्टों की क्रॉस जांच करे तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। नागौर आज भी इंतजार में है— मीठे पानी का, जवाबदेही का और उन भ्रष्टाचार की परतों के खुलने का, जिनकी सजा वह वर्षों से भुगत रहा है।

पत्रिका ने समय समय पर उठाया मुद्दा

नहरी परियोजना व जेजेएम में बरती गई अनियमितताओं को लेकर राजस्थान पत्रिका ने समय-समय पर समाचार प्रकाशित कर सरकार का ध्यान आकृष्ट किया, लेकिन तत्कालीन जलदाय विभाग मंत्री खुद शामिल होने से कार्रवाई नहीं हो सकी। पत्रिका ने 22 अप्रेल 2022 को ‘नहरी प्रोजेक्ट की खामियों को ढंकने का काम करेगा जेजेएम’, 7 नवम्ब 2022 को ‘पानी की तरह बहाया पैसा, फिर भी नहीं मिला पानी’ तथा 14 मई 2025 को ‘करोड़ों खर्च करने के बावजूद नागौर जिलेवासियों को नहीं मिल रहा पीने का पानी’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किए।