
Narmada Valley नरसिंहपुर. जिले की पहचान सिर्फ सर्वाधिक उपजाऊ कृषि भूमि वाले जिले से नहीं, बल्कि नर्मदा घाटी, वन संपदा और समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों से भी रही है। लेकिन वर्ष दर वर्ष जल-जंगल और जमीन पर बढ़ते दबाब, नर्मदा समेट अन्य नदियों के किनारे सिमटती हरित पट्टी, गिरता जलस्तर कई गंभीर संकेत दे रहा है। नर्मदा, शक्कर, दुधी, सीतारेवा, सिंदूृर, पाणाझिर, शेढ़, माछा आदि नदियों के तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक हरियाली का दायरा सिकुड़ रहा है, जबकि वन क्षेत्रों के आसपास मानवीय गतिविधियों का विस्तार पर्यावरणीय संतुलन के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है।
जिले में करीब 1 लाख 5 हजार 717 हेक्टयर रकबा वनक्षेत्र के रूप में चिन्हित है। जो जिले की भौगोलिक स्थिति के मान से बेहद कम हैं। जिले में राष्ट्रीय राजमार्गो के विकास के लिए सडक़ों के किनारे जो पेड़ों की कटाई हुई उसकी भरपाई आज तक सार्थक रूप से नहीं हो सकी है। वन विभाग को हाइवे किनारे पौधे लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसमें पौधे लगाए भी गए लेकिन उन्हें सहेजने और विकसित करने के लिए ईमानदारी से ध्यान नहीं दिया गया। जिससे मुंगवानी-नरसिंहपुर-सागर हाइवे पर फोरलेन किनारे पेड़ों की संख्या बेहद कम है।
नर्मदा घाटी की बदलती तस्वीर
जिले का अधिकांश भूभाग नर्मदा बेसिन में स्थित है। नर्मदा यहां केवल नदी नहीं बल्कि कृषि, भूजल, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी नदी के तटों पर मौजूद हरित पट्टी मिट्टी के कटाव को रोकने, भूजल पुनर्भरण बढ़ाने और जैव विविधता को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन जिले के कई तटीय क्षेत्रों में खेती, निर्माण गतिविधियों और अन्य मानवीय हस्तक्षेपों से प्राकृतिक वनस्पति का दायरा पहले की तुलना में कम हुआ है।
जंगल बचे हैं, लेकिन दबाव भी बढ़ा है
वन विभाग के रिकॉर्ड में जिले का एक बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र के रूप में दर्ज है, जहां सागौन, साल, बांस, साज, महुआ, हर्रा, बहेड़ा और अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां पाई जाती हैं। लेकिन जंगलों से लगे इलाकों में लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने वन क्षेत्रों की संवेदनशीलता बढ़ा दी है। वन विशेषज्ञ मानते हैं कि जंगलों का वास्तविक संरक्षण केवल सीमांकन से नहीं, बल्कि उनके आसपास के प्राकृतिक परिदृश्य को सुरक्षित रखने से संभव है।
हर साल लाखों पौधे, फिर भी हरित क्षेत्र क्यों नहीं बढ़ते?
जिले में प्रतिवर्ष विभिन्न विभागों और संस्थाओं द्वारा पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं। स्कूलों, पंचायतों, नहर किनारों, राजमार्गों और सार्वजनिक स्थलों पर पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन पौधे लगाने के बाद उनकी सुरक्षा, सिंचाई और निगरानी की व्यवस्था कमजोर रहने से बड़ी संख्या में पौधे शुरुआती वर्षों में ही नष्ट हो जाते हैं।
कृषि प्रधान जिले के सामने नई चुनौती
जिले की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में खेती और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होगी। भूजल दोहन, रासायनिक उपयोग और प्राकृतिक हरित क्षेत्रों में कमी का असर दीर्घकाल में कृषि पर भी पड़ सकता है।
वर्जन
नर्मदा किनारे की करीब 900 एकड़ भूमि जो 91 ग्रामों से लगी हुई है वहां हरित पट्टी विकास के लिए जिला प्रशासन ने कार्ययोजना बनाई है। जिससे चिन्हित भूमि में उद्यानिकी-वानिकी के कार्यो से हरियाली लाई जा सके। क्योंकि यही हरित पट्टी मृदा के कटाव को रोकते हुए हमारे पर्यावरण को समृद्ध बनाएगी।
गजेंद्र नागेश, सीईओ जिला पंचायत नरसिंहपुर