
1965 India Pakistan War: कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच जब 1965 में युद्ध हुआ, तो पूरा पाकिस्तान खौफ में था। वहां स्कूल बच्चों को हमले से बचने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। युद्ध स्तर शेल्टर बनाए जा रहे थे। सैन्य अधिकारियों के बच्चों को दूसरे नाम से पुकारने की प्रैक्टिस कारवाई जा रही थी, ताकि अगर वे दुश्मनों के हाथ लग जाएं तो उनका इस्तेमाल न किया जा सके। खासकर, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शहर मुर्री में सबसे ज्यादा बेचैनी थी। दरअसल, कश्मीर जाने वाली सड़क मुर्री से होकर गुज़रती थी, जिसे भारतीय सेनाके पाकिस्तान में घुसने के लिए सबसे मुफीद स्थान माना जाता था।
युद्ध की शुरुआत होते ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टोसंयुक्त राष्ट्र (United Nations) पहुंच गए, ताकि भारत पर दबाव बनाया जा सके।बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा‘डॉटर ऑफ डेस्टनी’ में लिखा है – युद्ध के बीच मुर्री स्थित कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी बोर्डिंग स्कूल की ननों ने अपनी छात्राओं को भारतीय हमले की आशंका की लिए तैयार किया। अधिकांश लोग मानते थे कि भारतीय सेना के लिए मुर्री पाकिस्तान का प्रवेश द्वार है। इसलिए यहां खौफ सबसे ज्यादा था। हवाई हमले की प्रैक्टिस और ब्लैकआउट आम हो गए थे। ननों ने स्कूल में पढ़ने वाली बड़ी लड़कियों को छोटी बच्चियों को शेल्टर तक ले जाने की ज़िम्मेदारी सौंपी, और मैंने अपनी बहन सनम भुट्टो (सनी) को रात में अपनी चप्पलें पैरों से बांधकर सोने के लिए कहा ताकि उन्हें ढूंढने में समय बर्बाद न हो। हमारे स्कूल की कई लड़कियां बड़े सरकारी या सैन्य अधिकारियों की बेटियां थीं, और हमने एक-दूसरे को नकली नाम दिए और उनकी प्रैक्टिस की, ताकि अगर हम दुश्मनों के हाथ लग जाएं तो वे हमारा इस्तेमाल न कर सकें। युद्ध के उन सत्रह दिनों के दौरान, हमले का खतरा काफी वास्तविक और बेहद डरावना था।
पाकिस्तान युद्ध में पहले से ही पस्त था और अमेरिका उसके लिए हालात और मुश्किल बना रहा था। बेनजीर ने ‘डॉटर ऑफ डेस्टनी’ में लिखा है – पाकिस्तान को कम्युनिस्ट खतरे से मुकाबले के लिए दिए गए हथियारों के भारत के खिलाफ इस्तेमाल को देखते हुए अमेरिका ने पूरे उपमहाद्वीप पर हथियारों की बिक्री पर रोक लगा दी। भारत को सोवियत संघ से भी हथियार मिल रहे थे, जबकि पाकिस्तान को नहीं। हालांकि, इस कमी के बावजूद हमारे सैनिकों ने 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा युद्धविराम की घोषणा तक लड़ाई जारी रखी।
हम अपनी सेना के प्रदर्शन से खुश थे, लेकिन हमारी खुशी ज़्यादा देर तक नहीं रही। दक्षिणी रूस के शहर ताशकंद में हुई शांति बातचीत के दौरान, राष्ट्रपति अयूब खान ने युद्ध के मैदान में हासिल की गई हमारी सारी जीत गंवा दी। ताशकंद समझौते के तहत, दोनों देश 5 अगस्त 1965 से पहले की अपनी सैन्य स्थितियों पर वापस लौटने के लिए सहमत हुए। मेरे पिता (जुल्फिकार आली भुट्टो) इससे बहुत नाराज हुए और उन्होंने विदेश मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। समझौते पर हस्ताक्षर के अगले ही दिन जब भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, तो मेरे पिता ने तंज कसते हुए कहा कि शायद उनकी मौत खुशी से हुई होगी।
बता दें कि 10 जनवरी 1966 को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए ताशकंद समझौता हुआ था। भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत, दोनों देश युद्ध से पहले वाली सैन्य स्थितियों पर वापस लौटने के लिए सहमत हुए। हालांकि, जब समझौते की शर्तें सामने आईं, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत में ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए, साथ ही पुलिस की बर्बरता की खबरें भी आईं। फिर भी, प्रदर्शन जारी रहे। और भुट्टो परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। जून 1966 में, अयूब ने आखिरकार जुल्फिकार अली भुट्टो का इस्तीफा मंज़ूर कर लिया। अयूब और भुट्टो के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आ चुके थे और एक राजनीतिक नेता के तौर पर भुट्टो के लिए लोगों का समर्थन तेजी से बढ़ गया था।