
Benazir Bhutto। Photo- ANI
Benazir Bhutto Daughter of Destiny 1971 War: 1971 के युद्ध में भारत से मिली करारी हार के बाद पाकिस्तान में बेचैनी थी। राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो हर हाल में भारत के साथ समझौता चाहते थे। 28 जून, 1972 को भारत से बातचीत के लिए वह अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ शिमला वाया चंडीगढ़ पहुंचे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद उनकी आगवानी के लिए मौजूद थीं। 71 की जंग में पाकिस्तान अपना सबकुछ गंवा चुका था। उसकी एयर फोर्स लगभग तबाह हो चुकी थी, आधी नेवी डूब चुकी थी और खजाना खाली था। पूर्वी पाकिस्तान उसके हाथ से निकल गया था, भारतीय सेना ने पश्चिम में उसकी 5,000 वर्ग मील भूमि पर कब्जा कर लिया और करीब 93,000 सैनिकों को युद्ध-बंदी बना लिया था। ऐसे में भारत से बातचीत पाकिस्तान के लिए अपने अस्तित्व को बचाने का एक मौका था।
जुल्फिकार अली भुट्टो बेचैन थे, क्योंकि इस बातचीत पर ही पाकिस्तान का भविष्य टिका था। उनके मन में अनगिनत सवाल उमड़ रहे थे। भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर को साथ लेकर आए थे। वह बेनजीर को अपने लिए भाग्यशाली मानते थे। जब पाकिस्तान का विशेष विमान चंडीगढ़ से कुछ ही दूरी पर था, तब जुल्फिकार अली भुट्टो ने बेनजीर से कहा– सबकी निगाह पर हम पर है। भारत जानता है कि हमारा पक्ष कमजोर है, लेकिन ये कमजोरी हमारे चेहरों पर नजर नहीं आनी चाहिए। तुम्हारे चेहरे पर न मुस्कान हो और न ही उदासी। मुस्कान से यह संदेश जाएगा कि पाकिस्तानी सैनिक भारत की कैद में हैं और राष्ट्रपति की बेटी मुस्कुरा रही है। जबकि उदासी को लोग निराशा का संकेत मान सकते हैं। किसी को भी यह कहने का कारण नहीं मिलना चाहिए- देखो उसके चेहरे को।
बेनजीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ डेस्टिनी’ (Daughter Of Destiny) में इसका जिक्र करते हुए लिखा है– मैं अपने पिता की समझाइश को समझ गई थी, लेकिन चेहरे पर कोई भाव न दिखाना बहुत मुश्किल काम था। हमारा विशेष विमान चंडीगढ़ पहुंचा, जहां से हमें हेलीकॉप्टर से शिमला ले जाया गया। एक फुटबॉल पिच पर जैसे ही हेलीकॉप्टर उतरा दर्जनों कैमरों के बीच खुद इंदिरा गांधी ने हमारा स्वागत किया। उनकी हाइट बेहद कम थी। हालांकि, वह शानदार लग रही थीं, यहां तक कि उस रेनकोट में भी जो उन्होंने खराब मौसम में अपनी साड़ी के ऊपर पहना था। मैंने अस्सलाम वालेकुम कहा और उन्होंने मुसकुराते हुए नमस्ते कहा। मैंने उन्हें जवाब में एक ऐसी आधी मुस्कान दी जिससे कुछ खास ज़ाहिर न हो। यानी मैंने अपने पिता की सीख का पालन किया।
एक तरफ भारत और पाकिस्तान के डेलीगेशन के बीच बातचीत परवान चढ़ रही थी। दूसरी तरह, बेनजीर भुट्टो के प्रति भारत में एक अलग ही क्रेज पनप रहा रहा था। अपनी किताब में भुट्टो ने लिखा है, हर बार जब मैं हिमाचल भवन से निकलती, जो पंजाब के ब्रिटिश गवर्नरों का पुराना घर था और जहां हम ठहरे हुए थे, तो लोग मुझे देखने के लिए सड़कों पर जमा हो जाते। लोगों की भीड़ हर जगह मेरा पीछा करने लगी। कई बार तो भीड़ इतनी बढ़ जाती कि ट्रैफिक रोकना पड़ता। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये क्या हो रहा है। भारत में मेरा स्वागत करने वालीं चिट्ठियों और टेलीग्रामों का ढेर लग गया। एक पत्र में तो यह सुझाव दिया गया कि मुझे भारत में पाकिस्तान का राजदूत नियुक्त किया जाए। पत्रकार और फीचर लेखक मेरा इंटरव्यू लेने के लिए होड़ करने लगे और मुझे ऑल इंडिया रेडियो पर बोलने के लिए बुलाया गया। यहां तक कि मेरा पहनावा नेशनल चर्चा का विषय बन गया। यह मेरे लिए शर्मिंदगी की बात थी, न केवल इसलिए कि वो कपड़े मैंने अपनी दोस्त की बहन से उधार लिए थे, बल्कि इसलिए भी कि हम भारत कपड़ों की नुमाइश के लिए नहीं आए थे। प्रेस मुझसे लगातार मेरे कपड़ों के बारे में सवाल पूछता रहा। एक दिन झुंझलाकर मैंने कह दिया, फैशन तो अमीर लोगों का शौक है।
जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो और पाकिस्तानी डेलीगेशन के साथ आए अधिकारियों के ठहरने का इंतजाम ‘हिमाचल भवन’ में किया गया था। एक दिन बेनजीर ने देखा कि उनके पिता बिस्तर पर सोने के बजाए जमीन पर लेटे हैं। वह हैरान थीं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति बिस्तर के बजाए जमीन पर सो रहे हैं। उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो से पूछा- आप ज़मीन पर क्यों सो रहे हैं?' जवाब मिला- मैं भारत में बिस्तर पर नहीं सो सकता। जब हमारे युद्ध-बंदियों के पास कैंप में सोने के लिए ज़मीन के अलावा कुछ भी नहीं है, तो मैं बिस्तर पर कैसे सो सकता हूँ। बेनजीर ने बाद में इस घटना का जिक्र एक चुनावी रैली में भी किया और जमकर तालियां बटोरी। ‘डॉटर ऑफ डेस्टिनी’ में बेनजीर ने लिखा है कि एक समय ऐसा भी आया जब बातचीत पटरी से उतरती नजर आई और पिता ने उनसे कहा कि सामान पैक कर लो, हम वापस जा रहे हैं। हालांकि, 2 जुलाई 1972 को वो खबर सामने आई, जिसका पाकिस्तान बेसब्री से इंतजार कर रहा था। भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता पर दस्तखत हुए। बेनजीर उस समय अपने कमरे में थी, तभी अचानक जोर-जोर से आवाजें आने लगीं– लड़का हुआ है, लड़का हुआ। यानी समझौता हो गया है। बनजीर भागते हुए नीचे आईं, जहां पत्रकारों की भीड़ के बीच पाकिस्तानी अधिकारियों के चेहरे पर खुशी थी। हालांकि, वह इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो को समझौते पर दस्तखत करते देखने से चूक गईं। लेकिन संतुष्टि इस बात की थी कि पाकिस्तान का अस्तित्व बच गया है।
बेनजीर ने अपनी किताब में लिखा है कि भारत शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान की 5,000 वर्ग मील भूमि लौटाने को तैयार हो गया। लेकिन पाकिस्तान के बंधक बनाए सैनिकों की रिहाई पर तुरंत कोई फैसला नहीं हुआ। मेरे पिता ने मुझसे पूछा, तुम्हें क्या लगता है मैंने अपनी जमीन छुड़ाने को तवज्जो क्यों दी? मैंने कहा– मुझे वाकई नहीं पता पापा। लेकिन अगर युद्ध बंधियों की रिहाई होती तो पाकिस्तान के लोग ज्यादा खुश होते। उन्होंने समझाते हुए कहा – इंदिरा गांधी ने भरोसा दिलाया है। वैसे भी युद्ध बंदी एक इंसानी प्रॉब्लम हैं और जब संख्या 93,000 हो तो ये प्रॉब्लम और भी बड़ी हो जाती है। भारत के लिए उन्हें हमेशा के लिए रखना अमानवीय होगा। इसके अलावा, उनके खान-पान पर खर्चा भी एक बड़ी समस्या बनेगा। जबकि जमीन कोई इंसानी प्रॉब्लम नहीं है। अरब अभी भी 1967 की लड़ाई में खोए इलाके को वापस पाने में कामयाब नहीं हुए हैं। ज़मीन पर कब्ज़ा, कैदियों की तरह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान नहीं खींचता। इसलिए चिंता मत करो, हमारे सैनिक भी रिहा होंगे।
कैदियों की रिहाई के समझौते के बिना वापस लौटना जुल्फिकार के लिए एक मुश्किल फैसला था और, जैसा कि आशंका थी, पाकिस्तान में इसे लेकर विरोध प्रदर्शन हुए। हालांकि, पाकिस्तान के बांग्लादेश को मान्यता देने के बाद सभी 93,000 कैदियों को रिहा कर दिया गया।
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
Updated on:
22 Sep 2026, 1:55 PM IST
Published on:
21 Sep 2026, 3:07 PM IST
बड़ी खबरें
View Allविदेश




