
चीन से 1962 के युद्ध में भारत हार गया तो पाकिस्तान को लगा कि उसके लिए रोटी सेंकने का बढ़िया वक्त है। 1965 में उसने भारत से युद्ध ठान लिया। शुरुआत में चोरी छिपे घुसा। लेकिन, उसे बेनकाब होते देर न लगी और भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया। 28 अगस्त को हाजीपुर पास पर कब्जे के बाद कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी घुसपैठियों के हमले में कमी आ गई थी। लेकिन, 1 सितंबर, 1965 को उसकी सेना ने अमेरिकी हथियारों से लैस होकर चांब सेक्टर में खुला युद्ध छेड़ दिया।
लेफ़्टिनेट जनरल हरबख्श सिंह उस समय पश्चिमी कमान के कमांडर थे। उन्होंने अपनी किताब 'इन द लाइन ऑफ ड्यूटी-अ सोल्जर रिमेंबर्स' में लिखा है कि सेना प्रमुख (जनरल जेएन चौधरी) ने उन्हें अखनूर की ओर से पाकिस्तान को जवाब देने के लिए कहा, लेकिन ले. ज. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की ओर से जवाब देने की इजाजत मांगी। भारत के इस कदम से पाकिस्तान के होश उड़ गए। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पंजाब से लगते सभी ठिकानों पर भारत के हमले से पाकिस्तान परेशान था।
पाकिस्तान ने लाहौर की सुरक्षा के लिए जो इच्छोगिल कनाल बनवाया था, ले. ज. सिंह उसी पर कब्जा करना चाह रहे थे। लेकिन 6 सितंबर की सुबह पाकिस्तानी सेना को कुछेक कामयाबी मिल गई। इससे उसका हौसला बढ़ा। बढ़े हुए हौसले और लाहौर पर बढ़ता खतरा देख कर उसने हवाई हमले तेज करने की योजना बना ली।
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 6 सितंबर को पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम उठा लिया था। उसके इसी कदम के चलते युद्ध का रूप भयंकर हो गया था। पाकिस्तान ने 6 सितंबर की रात में भारत पर ताबड़तोड़ हवाई हमले करने का फैसला ले लिया। जॉन फ्रीकर ने अपनी किताब 'द एयर वार ऑफ 1965' में इस हमले का पूरा ब्योरा लिखा है। उन्होंने बताया है कि पाकिस्तानी वायु सेना (पीएएफ) के ग्रुप कैप्टन डोगर को हमले का आदेश दे दिया गया। पीएएफ के बी-57 विमानों ने आधी रात के बाद पठानकोट, आदमपुर, हलवारा पर बम, रॉकेट और गोलों से ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए। ये हमले तड़के 4.30 बजे तक चले।
पाकिस्तान को ये बी-57 बमवर्षक विमान अमेरिका से मिले थे। इनकी तैनाती युद्ध से कुछ ही महीने पहले, मई 1965 में अमेरिका की मदद से की गई थी। पीएएफ के सारे पायलट्स इस विमान को उड़ाने की विशेषज्ञता तक नहीं रखते थे।
पीएएफ को 6-7 सितंबर की रात को भारतीय वायु सेना (आईएएफ) की हवाई पट्टियों को निशाना बनाने का आदेश मिला। हरेक 'टार्गेट' के लिए पांच-पांच मिनट के अंतराल पर चार-चार विमानों के उड़ान भरने की रणनीति बनाई गई। 6000 से 12000 फीट की ऊंचाई से विमानों को हमला करने के लिए कहा गया।
6 सितंबर की शाम 5 बजे जामनगर हवाई पट्टी पर हमले की योजना बनी थी। इस युद्ध में बी-57 का पहली बार इस्तेमाल यहीं होना था। इसके लिए पेशावर से बी-57 बमवर्षक विमानों को उड़ान भरना था। शाम के 4.30 बज गए थे। विंग कमांडर कुरैशी के नेतृत्व में छह विमानों को पेशावर पहुंचना था, पर वे पहुंचे नहीं थे। जब वे पहुंचे तो हमले में केवल 20 मिनट का वक्त बचा था। विमानों को बमों और रॉकेट्स से भर दिया गया था।
सारे विमान हमला कर वापस पाकिस्तान के मौरिपुर पहुंच गए। इसके बाद भी पाकिस्तान ने हमले बंद नहीं किए। उनकी रफ्तार जरूर कम कर दी। अब बी-57 की एक ही टुकड़ी के जरिए उसने पूरी रात जामनगर पर हमले जारी रखे। नौ घंटे में एक-एक क्रू को तीन-तीन बार हमले के लिए भेजा गया। तीन अफसरों का एक क्रू एक बार गया तो लौटने में देर हो गई। इस दल में स्क्वाड्रन लीडर शब्बीर आलम सिद्दीकी और असलम कुरैशी शामिल थे। उनके बारे में कुछ भी पता नहीं चल रहा था। शायद थकान के चलते उनका विमान ज्यादा नीचे उतर गया था और बादलों के चलते ओझल हो गया था। बादल छंटने के बाद जब उनका पता चला तो पाकिस्तान ने रात में किसी भी क्रू को एक सीमा तक ही दोबारा युद्द के लिए भेजे जाने की नीति बनाई।
जामनगर के साथ पाकिस्तान ने आदमपुर और भारत के अन्य ठिकानों को निशाना बनाया। उस रात का अंतिम हमला पीएएफ के स्क्वाड्रन लीडर नजीब खान की अगुआई में किया गया था। खान को ब्यास नदी पर बने एक पुल को ध्वस्त करने का लक्ष्य दिया गया था। यह पुल आदमपुर और अमृतसर को जोड़ता था। पाकिस्तान की चाल थी कि इसे ध्वस्त कर भारतीय सेना की सप्लाई रोकी जाए। इस चाल के साथ तड़के चार बजे पेशावर से चार बी-57 बमवर्षक रवाना हुए और बम बरसा कर वापस चले गए।
6-7 सितंबर की रात पाकिस्तान के हमलों के बाद युद्ध का रुख ही बदल गया था। पाकिस्तान को कुछ समय के लिए अपना पलड़ा भले ही भारी होता दिखा, लेकिन भारत ने भी मुंहतोड़ जवाब दिया और अंत में मुंह की भी खिलाई।