
Abhishek Manu Singhvi on SIR : नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा है। वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर सवाल उठाए। सिंघवी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या के लिए एक अलग कार्यालय बना रखा है। उन्होंने कहा कि एक तरफ मुख्य चुनाव आयुक्त को और दूसरी तरफ गृह मंत्रालय को रखा गया है। उन्होंने कहा कि देश पहले ही विभिन्न संस्थाओं पर 'बुलडोजर' चलने की बात सुनता रहा है, लेकिन अब चुनाव आयोग के भीतर भी एक 'आंतरिक बुलडोजर' दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई साल पहले स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। उनके मुताबिक, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सभी चुनाव आयुक्त समान हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी चुनाव आयुक्तों से श्रेष्ठ नहीं हैं। सिंघवी ने कहा कि CEC को 'फर्स्ट अमंग इक्वल्स' (समान लोगों में प्रथम) माना जाता है। इसलिए चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका और अधिकार महत्वपूर्ण हैं।
सिंघवी ने रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सामने आए खुलासे केवल चुनाव आयोग या उसकी संवैधानिक भूमिका को लेकर सवाल खड़े नहीं करते, बल्कि यह भी बताते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने ही सहयोगियों को गुमराह किया। उन्होंने आरोप लगाया कि CEC पर देश को गुमराह करने और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं, लेकिन अब सामने आई जानकारी से उनके अपने साथी चुनाव आयुक्तों के साथ कथित तौर पर अलग व्यवहार का मुद्दा भी सामने आया है।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि 10 महीनों के भीतर चुनाव आयुक्त एस. एस. संधू और विवेक जोशी ने आयोग के निर्णयों पर 14 बार लिखित विरोध दर्ज कराया, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि 13 अगस्त को चुनाव आयुक्त संधू ने लिखा कि फॉर्म-6 में किए गए बदलाव पूरी तरह अनधिकृत और गैर-कानूनी हैं। इस पर आयोग की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। मई के महीने में आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी कि चुनाव आयोग के अपने ही चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को आयोग के आईटी विभाग द्वारा सिस्टम का एक्सेस नहीं दिया जा रहा था। अगस्त में संधू ने मुद्दा उठाया कि पश्चिम बंगाल में जिन 38 लाख लोगों के नाम हटाए गए, उनमें से 20-22 लाख लोगों ने अपील की। हैरत की बात यह रही कि इसमें से 16 लाख अपीलें खुद चुनाव आयोग की प्रक्रिया के कारण हुईं।