जैकब ने अपनी डायरी में लिखा था कि उनके पास केवल चंद सौ सैनिक थे, जबकि नियाजी के पास हजारों, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने नियाजी को तोड़ दिया। वह 30 मिनट इतिहास के सबसे लंबे मिनट थे, जिसके बाद नियाजी ने बिना शर्त सरेंडर के लिए 'हां' कह दिया।
Army Day Special: भारतीय सेना के शौर्य का प्रतीक हर साल 15 जनवरी को 'सेना दिवस' (Army Day) उन वीरों की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने देश की संप्रभुता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जब हम भारतीय सेना की सबसे बड़ी जीत यानी 1971 के 'फॉल ऑफ ढाका' (Fall of Dhaka) की बात करते हैं, तो एक नाम सबसे ऊपर चमकता है— लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर. जैकब। वे 1971 के युद्ध के दौरान पूर्वी कमान के चीफ ऑफ स्टाफ थे और उनकी कूटनीति ने विश्व इतिहास का भूगोल बदल दिया।
गोलियों की जगह दिमाग से जीती जंग 1971 के युद्ध में भारतीय सेना ढाका के करीब थी, लेकिन शहर के अंदर अब भी करीब 30,000 पाकिस्तानी सैनिक मौजूद थे। युद्ध लंबा खिंच सकता था और भारी जनहानि हो सकती थी। जनरल जैकब ने एक मास्टरप्लान तैयार किया। उन्होंने पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाजी को एक ऐसा मनोवैज्ञानिक झांसा दिया कि नियाजी को लगा कि वे चारों तरफ से घिर चुके हैं और उनके पास आत्मसमर्पण के अलावा कोई चारा नहीं है।
नियाजी का सरेंडर 16 दिसंबर 1971 को जनरल जैकब बिना किसी सुरक्षा के अकेले ढाका स्थित नियाजी के मुख्यालय पहुँच गए। उन्होंने नियाजी के सामने आत्मसमर्पण का दस्तावेज़ रखा और उन्हें सोचने के लिए सिर्फ 30 मिनट का समय दिया। जैकब ने अपनी डायरी में लिखा था कि उनके पास केवल चंद सौ सैनिक थे, जबकि नियाजी के पास हजारों, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने नियाजी को तोड़ दिया। वह 30 मिनट इतिहास के सबसे लंबे मिनट थे, जिसके बाद नियाजी ने बिना शर्त सरेंडर के लिए 'हां' कह दिया।
93,000 सैनिकों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण जनरल जैकब की इस दिलेरी का नतीजा यह हुआ कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण हुआ। 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने सार्वजनिक रूप से हथियार डाले और दुनिया के नक्शे पर एक नए राष्ट्र 'बांग्लादेश' का उदय हुआ।
आधुनिक सेना के लिए प्रेरणा लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर. जैकब का जीवन और उनकी युद्ध कला आज भी सैन्य अकादमियों में पढ़ाई जाती है। आर्मी डे के अवसर पर उनकी यह गाथा हमें याद दिलाती है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि अदम्य साहस और कुशाग्र बुद्धि से जीते जाते हैं। भारतीय सेना का यह गौरवशाली अध्याय आज भी हर नागरिक के सीने को गर्व से चौड़ा कर देता है।