असम सीएम हिमंत बिस्वा सरमा का राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू होकर BJP के सबसे प्रभावशाली चेहरों तक पहुंचा। परिवारवाद से उपजे मतभेदों ने उनकी दिशा बदली और आज वह असम की राजनीति के सबसे मजबूत नेताओं में गिने जाते हैं।
असम की राजनीति में हिमंत बिस्वा सरमा का नाम आज सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाले सरमा कभी कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल थे और राज्य सरकार के कई अहम विभाग संभाल चुके थे। लेकिन पार्टी के भीतर परिवारवाद और नेतृत्व को लेकर बढ़ते मतभेदों ने उनकी राजनीतिक दिशा बदल दी। वर्ष 2015 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने वाला यह नेता आज असम की राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा बन चुका है। लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हिमंत सरमा अब विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर जोर दे रहे हैं।
हिमंत सरमा ने 2001 में जालुकबारी सीट से जीत दर्ज कर असम विधानसभा में प्रवेश किया। तरुण गोगोई सरकार में उन्हें स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा और लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली। इन विभागों में सक्रिय कामकाज के कारण उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा और वह कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाने लगे। उस दौर में राजनीतिक गलियारों में उन्हें तरुण गोगोई का संभावित उत्तराधिकारी भी माना जाने लगा था। उनकी संगठन क्षमता और जनता के बीच पहुंच ने कांग्रेस को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
राजनीतिक मोड़ तब आया जब तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई की सक्रियता पार्टी में तेजी से बढ़ने लगी। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा शुरू हो गई कि नेतृत्व परिवार आधारित राजनीति को आगे बढ़ा रहा है। इसी दौरान हिमंत सरमा और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी भी लगातार बढ़ती गई। लंबे समय तक असंतोष रहने के बाद उन्होंने 2015 में कांग्रेस छोड़ दी और BJP का दामन थाम लिया। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि सरमा के जाने के बाद पार्टी असम में कभी पूरी तरह संभल नहीं पाई। उनकी विदाई ने राज्य की राजनीति का संतुलन बदल दिया।
BJP में शामिल होने के बाद हिमंत सरमा केवल असम तक सीमित नहीं रहे। पार्टी नेतृत्व ने पूर्वोत्तर राज्यों में संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंपी। धीरे-धीरे वह चुनावी रणनीति और राजनीतिक समझ के कारण पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में शामिल हो गए। 2021 में पहली बार असम के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ओरुनोदोई और निजुत मोइना जैसी योजनाओं के जरिये महिलाओं और गरीब परिवारों तक मजबूत पहुंच बनाई। हालांकि अवैध घुसपैठ, बेदखली अभियान और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उनकी सरकार लगातार विवादों में भी रही। इसके बावजूद BJP समर्थक उन्हें निर्णायक नेता मानते हैं।