
Prashant Kishor Bihar : बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार महज दो सीटों का नुकसान नहीं मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में इसे पार्टी के लिए ऐसे संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया है कि मजबूत माने जाने वाले गढ़ों में भी मतदाता अब पहले की तरह एकतरफा फैसले नहीं कर रहे। यही वजह है कि इन नतीजों के बाद भाजपा के भीतर और एनडीए के सहयोगी दलों में गंभीर मंथन शुरू हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन परिणामों ने दो बड़े संदेश दिए हैं। पहला, भाजपा का पारंपरिक समर्थक वर्ग अब हर फैसले को बिना सवाल स्वीकार करने के मूड में नहीं दिख रहा। दूसरा, पार्टी में नई पीढ़ी को आगे लाने की रणनीति को पुराने और प्रभावशाली नेताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है।
एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं का मानना है कि सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद किसी भी दल को यह नहीं मान लेना चाहिए कि मतदाता हमेशा उसके साथ रहेगा। गठबंधन के नेताओं के अनुसार जनता अब पहले से अधिक सजग है और यदि उसे अहंकार या स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी महसूस होती है तो वह चुनाव में उसका जवाब भी देती है।
बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के नेताओं का कहना है कि यह परिणाम पूरे एनडीए के लिए चेतावनी है। विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के कुछ ही महीनों बाद ऐसा नतीजा आना बताता है कि जनता का मूड तेजी से बदल भी सकता है।
बांकीपुर सीट भाजपा की सबसे सुरक्षित सीटों में गिनी जाती रही है। वर्ष 1995 से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में थी। पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके बेटे तथा वर्तमान भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस सीट पर लगातार जीत दर्ज की। नितिन नवीन ने पिछले विधानसभा चुनाव में करीब 50 हजार वोटों से जीत हासिल की थी।
ऐसे में इसी सीट पर पार्टी की हार को भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। क्योंकि उम्मीदवार चयन में भी नितिन नवीन की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है, इसलिए राजनीतिक जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा उनके कंधों पर आने की चर्चा भी तेज हो गई है।
बांकीपुर में भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित किया था, लेकिन अंतिम समय में उनकी जगह नीरज कुमार को टिकट दे दिया गया। इस बदलाव का स्पष्ट कारण सामने नहीं आया, जिससे कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी रही।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि चुनाव जैसे संवेदनशील समय में उम्मीदवार बदलने से संगठन की एकजुटता पर असर पड़ता है और इसका फायदा विरोधी दल उठा लेते हैं।
मध्य प्रदेश के दतिया में भाजपा ने लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति का चेहरा रहे वरिष्ठ नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा की जगह युवा चेहरे पर भरोसा जताया। हालांकि टिकट नहीं मिलने से मिश्रा की नाराजगी सार्वजनिक रूप से सामने आई थी।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि स्थानीय स्तर पर पूरी तरह एकजुटता नहीं बन पाने का असर मतदान पर पड़ा और भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ा। इससे यह संदेश भी गया कि केवल नया चेहरा उतारना पर्याप्त नहीं होता, संगठन के अनुभवी नेताओं को साथ लेकर चलना भी उतना ही जरूरी है।
बिहार में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने शुरुआत से ही बांकीपुर उपचुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया था। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान इसे राज्य के नेतृत्व पर जनमत संग्रह की तरह पेश किया और मतदाताओं से भाजपा को संदेश देने की अपील की।
विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा विरोधी वोटों के बेहतर ध्रुवीकरण और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने में जन सुराज को सफलता मिली। हालांकि कई भाजपा नेताओं का मानना है कि यह केवल विपक्ष की जीत नहीं, बल्कि भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में आई कमजोरी का संकेत अधिक है।
पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन की नियुक्ति ने भी संगठन में नई बहस को जन्म दिया। कई अनुभवी नेताओं को पीछे छोड़कर उन्हें जिम्मेदारी मिलने से असंतोष की चर्चाएं पहले से चल रही थीं। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी बड़े दल में नेतृत्व परिवर्तन आसान प्रक्रिया नहीं होती और इसके साथ आंतरिक चुनौतियां भी जुड़ी रहती हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के एक सांसद का यह बयान कि पार्टी के टिकट पर "कोई भी जीत सकता है" विपक्ष के साथ-साथ सहयोगी दलों के निशाने पर आ गया। नतीजे आने के बाद इस बयान को लेकर भी पार्टी के भीतर सवाल उठे और कई नेताओं ने माना कि चुनाव में मतदाता को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। इस बार भी भाजपा और एनडीए को न तो सवर्ण मतदाताओं का पूरी तरह समर्थन मिला और न ही जेडीयू के पारंपरिक सामाजिक आधार का पूरा वोट ट्रांसफर हो सका। इससे विपक्ष को बढ़त बनाने का अवसर मिला।
इन दोनों उपचुनावों ने भाजपा के सामने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। संगठन की एकजुटता, उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखने जैसी चुनौतियों पर अब गंभीरता से काम करना होगा। क्योंकि अगले कुछ महीनों में बिहार विधानसभा चुनाव सहित कई महत्वपूर्ण राजनीतिक मुकाबले होने हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उपचुनावों के नतीजे अक्सर भविष्य की राजनीति की दिशा का संकेत देते हैं। हालांकि इन्हें सीधे लोकसभा या विधानसभा चुनाव का पैमाना नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना तय है कि भाजपा के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का अवसर भी हैं और चेतावनी भी कि लोकतंत्र में मतदाता का भरोसा हर चुनाव में दोबारा जीतना पड़ता है।