
BJP: अटल के गांधीवादी समाजवाद से आडवाणी की रथयात्रा तक, फिर गठबंधन की राजनीति और 2014 के बाद मोदी युग। अयोध्या और अनुच्छेद 370 जैसे पुराने एजेंडे पूरे हो चुके हैं। अब समान नागरिक संहिता और 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की राजनीति के बीच सवाल यह है कि 2029 से पहले बीजेपी का अगला वैचारिक पड़ाव क्या होगा?भारतीय जनता पार्टी की आज की राजनीति को समझने के लिए उसकी शुरुआत तक लौटना जरूरी है। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। संघ के साथ वैचारिक और संगठनात्मक संबंध रखने वाली जनसंघ की राजनीति में राष्ट्रीय एकीकरण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण प्रमुख मुद्दों में रहे। दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में 'एकात्म मानववाद' को पार्टी की वैचारिक आधारभूमि दी।
लेकिन 1980 में जब जनता पार्टी से अलग होकर बीजेपी बनी तो उसका शुरुआती चेहरा आज की तुलना में अलग था। अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के पहले अध्यक्ष बने। बीजेपी ने अपने शुरुआती दौर में 'पंचनिष्ठा' के तहत राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकीकरण, लोकतंत्र, गांधीवादी समाजवाद, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य आधारित राजनीति को प्रमुख प्रतिबद्धताओं के तौर पर रखा। यह प्रयोग बहुत लंबे समय तक नहीं चला। 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद पार्टी के भीतर वैचारिक दिशा को लेकर बदलाव शुरू हुआ। 1989 में बीजेपी 85 सीटों तक पहुंची और 1991 में उसकी संख्या बढ़कर 120 हो गई।
बीजेपी के वैचारिक बदलाव में राम जन्मभूमि आंदोलन निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जून 1989 में पालमपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन का फैसला किया। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथयात्रा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को हिरासत में लिया गया। 1991 के चुनाव में बीजेपी 120 सीटों तक पहुंची। दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा कारसेवकों द्वारा गिराए जाने के बाद भारतीय राजनीति का पूरा विमर्श बदल गया। इसके बाद राम मंदिर बीजेपी की पहचान से स्थायी रूप से जुड़ गया।
लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए सिर्फ हिंदुत्व का मुद्दा पर्याप्त नहीं था। 1996 में बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी। 1998 और 1999 में भी बीजेपी 182 सीटों पर रही। यही वह दौर था जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA के जरिए गठबंधन की राजनीति को अपनाया। इस दौर में बीजेपी के कई वैचारिक मुद्दे सरकार के साझा एजेंडे से बाहर रहे। यानी पार्टी के लिए सत्ता में बने रहना और गठबंधन सहयोगियों को साथ रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया।
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पहली बार अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल किया और 282 सीटें जीतीं। 2019 में यह संख्या बढ़कर 303 हुई। 2024 में बीजेपी 240 सीटों पर रही और सरकार बनाने के लिए NDA सहयोगियों पर निर्भर हुई।मोदी युग में बीजेपी का राजनीतिक मॉडल केवल हिंदुत्व तक सीमित नहीं रहा। राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, मजबूत नेतृत्व, इंफ्रास्ट्रक्चर, गरीबों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच और सांस्कृतिक पहचान, इन सभी को एक साथ राजनीतिक नैरेटिव में जोड़ा गया।
इसी दौर में बीजेपी के लंबे समय से चले आ रहे कुछ प्रमुख वैचारिक मुद्दों पर कानून या संवैधानिक कार्रवाई हुई। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव किया गया। इसके बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता खुला। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने 5 फरवरी 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया। इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून (CAA), 2019 लागू हुआ और इसके नियम मार्च 2024 में अधिसूचित किए गए। बीजेपी ने 2024 के घोषणापत्र में CAA को लागू करने और समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इस तरह देखें तो बीजेपी के पुराने वैचारिक एजेंडे में राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे दो बड़े मुद्दे अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। UCC अभी भी पार्टी के घोषित एजेंडे में मौजूद है।
यही 2029 से पहले बीजेपी की राजनीति का सबसे संवेदनशील सवाल है। काशी के ज्ञानवापी और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद अदालतों में लंबित हैं। 1991 का Places of Worship Act धार्मिक स्थलों की स्थिति को 15 अगस्त 1947 के आधार पर बनाए रखने की व्यवस्था करता है और अयोध्या को इससे अपवाद रखा गया था। इसी कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी, कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल से जुड़े मामलों में बातचीत के जरिए समाधान की संभावना तलाशने के लिए विशेष लोक अदालत की पहल की थी, लेकिन संबंधित पक्षों की ओर से मध्यस्थता को लेकर सहमति नहीं बनी। सितंबर 2026 में कृष्ण जन्मभूमि मामले की सुनवाई फिर टली। महत्वपूर्ण बात यह है कि काशी और मथुरा को बीजेपी का आधिकारिक अगला राजनीतिक एजेंडा कहना अभी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। 2022 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने स्पष्ट कहा था कि पार्टी ने राम जन्मभूमि के बाद काशी-मथुरा को लेकर कोई राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव पारित नहीं किया है और इन मामलों का फैसला संविधान और अदालतों के अनुसार होगा। यानी अयोध्या के बाद काशी और मथुरा राजनीतिक विमर्श में जरूर हैं, लेकिन उनका अगला पड़ाव फिलहाल अदालतों और कानूनी प्रक्रिया से तय होना है।