
West Bengal Elections 2026: मां-माटी-मानुस की सियासत करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी को सिंगूर की जमीन ने ही राज्य की सत्ता के सिंहासन पर पहुंचाया था। अब एकबार फिर सिंगूर का मुद्दा गरम होने लगा है। तब यानी साल 2008 में TMC नेता ममता बनर्जी ने सिंगूर में टाटा की नैनो कार का प्लांट (Tata's Nano Car Plant) लगाने के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। टाटा ग्रुप को हार माननी पड़ी थी और लखटकिया कार प्लांट का बोरिया, बिस्तर बांधकर राज्य से भागना पड़ा था। यही लेफ्ट की बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार की ताबूत में आखिरी कील भी साबित हुई। साथ ही, 34 साल के 'लाल राज' का अंत हो गया। अब उसी टाटा की सिंगूर में वापसी का वादा करके बीजेपी सत्ता परिवर्तन करना चाहती है।
दरअसल, 18 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिंगूर में एक बड़ी रैली होने वाली है। पीएम मोदी की रैली को लेकर केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि पीएम मोदी ने साल 2008 में गुजरात के तत्कालीन सीएम रहते हुए टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का खुले दिल से स्वागत किया था। इसके कारण अगर आज वहां कोई जाएगा तो देख सकता है कि वह इलाका ऑटोमोबाइल हब बन चुका है।
केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी की मदद से बंगाल में उद्योगों को दोबारा स्थापित किया जाएगा। जिस जमीन ने ममता बनर्जी को सत्ता दिलाई। वही, जमीन उनके सियासी कार्यकाल का अंत भी करेगी। उन्होंने कहा कि 18 जनवरी को पीएम मोदी सिंगूर आ रहे हैं। बीजेपी की सरकार आने पर भविष्य में टाटा भी वापस आएगा।
बीजेपी के इस दांव का तृणमूल के नेताओं ने पलटवार भी किया है। तृणमूल नेता कुणाल घोष ने कहा कि सिंगूर आंदोलन कभी भी टाटा या इंडस्ट्रियलाइजेशन के बारे में नहीं था। टाटा ने बंगाल में बहुत ज्यादा निवेश किया है। सिंगूर एक बड़े संघर्ष के बारे में था, जिसका नेतृत्व ममता बनर्जी ने एक राज्य के सिद्धांत के खिलाफ किया था, जिसमें कई फसल वाली खेती की जमीन लेकर उसे प्राइवेट इंडस्ट्री को दिया जा रहा था।
कृषि भूमि रक्षा समिति के पूर्व नेता ने मीडिया से कहा हम चाहते हैं कि खेती योग्य जमीन का इस्तेमाल खेती के लिए ही किया जाए, बाकी जमीन पर उद्योग लगाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि मुश्किलें होंगी, लेकिन हम अपना समर्थन सरकार को देंगे। उन्होंने कहा कि 300 एकड़ जमीन का इस्तेमाल खेती के लिए किया जा रहा है। 300 एकड़ और जमीन खेती के लिए उपयुक्त है। बाकी बचे 400 एकड़ जमीन पर उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। खेती और उद्योग में सामंजस्य बनाकर चलना होगा।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि साल 2019 से ही भाजपा राज्य में लेफ्ट के वोटरों को रिझाने में जुटी हुई है। बीजेपी की यह चाहत है कि लाल झंडे को थामने वाले काडर उन्हें सिर्फ सियासी ध्रुवीकरण की वजह से न जाने। पार्टी यह भी संकेत देने की कोशिश कर रही है कि वह राज्य में सत्ता में आने पर उद्योग स्थापित करेगी। राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश आएगा। जैसा कि पूर्व लेफ्ट सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासन काल में हुआ था।
वहीं, ममता बनर्जी के सामने बड़े उद्योगों को स्थापित करने की चुनौती बीते 15 सालों से है। सिंगूर की वजह से आज भी बड़े औद्योगिक घराने राज्य में अपनी ईकाई स्थापित करने से कतरा रहे हैं।
सिंगूर एक बार फिर से 15 साल बाद यानी 2023 में भी चर्चा में आया था। उसकी वजह यह थी कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर में नैनो कार प्लांट के ठप होने से नुकसान की भरपाई के लिए टाटा मोटर्स को हर्जाने के तौर पर करीब 766 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया। हालांकि, ममता बनर्जी ने इसपर यह टिप्पणी की थी कि उसके पास कई विकल्प मौजूद हैं। वहीं, बीते साल 9 जुलाई 2025 को टाटा ग्रुप के अध्यक्ष नटराजन चंद्रशेखरन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कोलकाता में मुलकात की थी। वह तस्वीर भी सियासी गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा की वजह बनी थी।
टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा ने 18 मई 2006 को तत्कालीन सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य और राज्य के वाणिज्य मंत्री निरुपम सेन के साथ बैठक के बाद सिंगूर में नैनो कार परियोजना लगाने का एलान किया था। उस समय रतन टाटा देश को लखटकिया कार का सपना दिखा रहे थे। वहीं, बुद्धदेव के नेतृत्व में 'लाल सरकार' अपने ऊपर लगे उद्योग विरोधी छवि को हटाना चाहते थे। इसके बाद टाटा के लिए सिंगूर में एक हजार एकड़ जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन हुगली जिला प्रशासन की ओर से बुलाई गई तमाम बैठकों का तृणमूल कांग्रेस ने बहिष्कार किया था।
30 नवंबर 2006 को पुलिस ने जब ममता बनर्जी को सिंगूर जाने से रोक दिया तो तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में बड़े पैमाने पर हंगामा और तोड़-फोड़ की थी। फिर विपक्ष की नेता के रूप में ममता बनर्जी ने तीन दिसंबर 2006 से कोलकाता में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आमरण अनशन शुरू किया। इसके बाद मामला काफी बढ़ गया और लेफ्ट सरकार को पीछे हटना पड़ा। साथ ही, टाटा अपनी इकाई समेट कर गुजरात चली गई।