
Reliance Communications case: रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (RCom) से जुड़े करोड़ों रुपये के बैंक फ्रॉड और फंड डायवर्जन (फंड को गलत तरीके से दूसरी जगह भेजने) मामले में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने बड़ी कार्रवाई की है। शुक्रवार को CBI ने मुंबई में स्पेशल जज के सामने इस मामले में अपनी दूसरी चार्जशीट दाखिल की।
इस नई चार्जशीट में तीन मुख्य आरोपियों के नाम शामिल हैं, जिनमें एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कंपनी नेटिजन इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड और उसके दो डायरेक्टर अनिल कल्याण और टुनू साहू शामिल हैं। CBI ने आरोपियों पर आपराधिक साजिश, आपराधिक गबन और धोखाधड़ी (बैंकिंग फ्रॉड) जैसे आरोप लगाए हैं।
CBI की लंबी जांच के बाद दाखिल की गई इस दूसरी चार्जशीट में M/s नेटिजन इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड को मुख्य आरोपी बनाया गया है। गौरतलब है कि इस कंपनी का पुराना नाम M/s रिलायंस इन्फोकॉम इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड था। CBI की जांच से पता चला कि रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (RCom) ने इस कंपनी का इस्तेमाल 'पास-थ्रू' एंटिटी के तौर पर किया, यानी एक ऐसा जरिया जिसका मकसद सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह फंड ट्रांसफर करना था।
सीबीआई का आरोप है कि बैंकों से लोन के तौर पर लिए गए फंड को तय शर्तों का उल्लंघन करते हुए जानबूझकर इस कंपनी के जरिए दूसरी जगहों पर भेजा गया। इस सोची-समझी साजिश के तहत लोन देने वाले सरकारी बैंकों को भारी वित्तीय नुकसान हुआ, जबकि आरोपियों और उनसे जुड़ी शेल कंपनियों को सीधा और गैर-कानूनी फायदा मिला।
इस धोखाधड़ी के मुख्य सूत्रधारों में शामिल मैसर्स नेटिजन इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड के दो डायरेक्टर अनिल काल्या और टुनू साहू को भी इस चार्जशीट में सीधे तौर पर आरोपी बनाया गया है। केंद्रीय एजेंसी का आरोप है कि इन डायरेक्टरों ने नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए रिलायंस कम्युनिकेशंस के फंड को गैर-कानूनी तरीके से ट्रांसफर करने में सक्रिय भूमिका निभाई।
CBI ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि रिलायंस ADA ग्रुप से जुड़े इन अलग-अलग बैंक फ्रॉड मामलों में अब तक कुल छह मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कानूनी कार्रवाई के बाद जमानत याचिकाएं खारिज होने के कारण ये सभी आरोपी अभी न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं।
इस बड़े कॉर्पोरेट और बैंकिंग धोखाधड़ी मामले की गंभीरता और बड़े पैमाने को देखते हुए, पूरी जांच की निगरानी खुद माननीय सुप्रीम कोर्ट कर रहा है। शीर्ष अदालत लगातार प्रोग्रेस रिपोर्ट की समीक्षा कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच में कोई ढिलाई न हो।