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Chirag Paswan Birthday: 43 के चिराग, राम विलास पासवान की मौत के बाद ऐसे कराया पार्टी का पुनर्जन्म

Chirag Paswan Birthday: 31 अक्तूबर, 1982 को जन्मे चिराग पासवान अभी उम्र के चौथे ही दशक में हैं। पिता की छाया से मुक्त होकर राजनीति करते हुए उन्हें करीब छह साल ही हुए हैं, लेकिन इन छह सालों में उन्होंने अपनी राजनीति को जो विस्तार दिया है, वह निश्चित रूप से उनके पिता की आत्मा को संतोष देने वाला है। हालांकि, वह जीते जी बेटे के काम से खुश और संतुष्ट थे।
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Updated: 31 Oct 2026, 12:58 PM IST
Chirag Paswan rise and fall story, Chirag Paswan profile
चिराग पासवान पिता की पहचान से अलग पहचान बनाते हुए राजनीति में आगे बढ़ रहे हैं। (इमेजिंग: एआई)

Chirag Paswan Political Journey: 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव की गहमागहमी थी। पटना में श्रीकृष्णपुरी के अपने घर पर राम विलास पासवान कुछ करीबी लोगों के साथ बातें कर रहे थे। बगल के कमरे में चिराग पासवान लोजपा कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे। तब राम विलास ने पिता के गर्व और संतुष्टि वाले भाव के साथ कहा था- चिराग ने सब संभाल लिया है। चिराग नए-नए सांसद (जमुई से) बने थे और विधान सभा चुनाव में पूरी तरह सक्रिय थे।

राम विलास पासवान हर पिता की तरह बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। हालांकि, वह जीते जी चिराग का भविष्य सुरक्षित कर गए थे, लेकिन उनके जाने के बाद चिराग का जीवन संघर्षों से भरा रहा। चाचा से 'लड़ाई' हो गई, पार्टी टूट गई। सब कुछ नए सिरे से करना पड़ा।

2020 का बिहार विधान सभा चुनाव पिता के बिना चिराग के लिए पहली राजनीतिक परीक्षा थी। इसमें वह फेल हो गए थे। 153 सीटों पर लड़ कर, केवल एक जीत सके थे। लेकिन, यह हार भी एक बड़ी संभावना लेकर आई थी। चिराग को सीट भले ही एक मिली हो, लेकिन वोट 6 फीसदी मिल गए थे। यह आंकड़ा उम्मीदों से भरा था। अनुसूचित जाति (एससी, पासवान/दुसाध) की पांच फीसदी आबादी वाले राज्य में उन्हें छह फीसदी वोट मिले थे। फिर भी, कई विश्लेषकों ने उन्हें खारिज कर दिया। लेकिन, चिराग ने परवाह नहीं की।

इस तरह आगे बढ़ता गया चिराग पासवान का राजनीतिक सफर

साल पद / घटनाप्रमुख विवरण
2012राजनीति में प्रवेशलोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के सदस्य के रूप में औपचारिक रूप से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।
2014प्रथम बार सांसद (16वीं लोकसभा)बिहार की जमुई सीट से चुनाव जीता और पहली बार सांसद बने।
2014 – 2019LJP युवा मोर्चा के अध्यक्षपार्टी के युवा विंग (Youth Wing) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में संगठन को मजबूती दी।
2019 (मई)दूसरी बार सांसद (17वीं लोकसभा)जमुई लोकसभा सीट से पुनः भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज की।
2019 (नवंबर)LJP के राष्ट्रीय अध्यक्षअपने पिता रामविलास पासवान के स्थान पर लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।
2020 (अक्टूबर)"बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट" अभियानबिहार विधानसभा चुनाव में "बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट" का नारा देकर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा।
2021 (अक्टूबर)LJPR पार्टी का गठनपार्टी में विभाजन के बाद अपनी नई पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का गठन किया और अध्यक्ष बने।
2024 (जून)तीसरी बार सांसद (18वीं लोकसभा)अपने पिता की पारंपरिक सीट हाजीपुर से 1 लाख से अधिक वोटों के अंतर से लोकसभा चुनाव जीता।
9 जून 2024 – वर्तमानकेंद्रीय कैबिनेट मंत्रीमोदी सरकार (Modi 3.0) में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री (Minister of Food Processing Industries) का पदभार संभाला।

राम विलास पासवान को सत्ता में बने रहने के लिए किसके साथ जाना है, यह पहचान करने में महारत थी। इसके लिए उन्हें कुछ लोग 'मौसम विज्ञानी' कहा करते थे। कहते हैं, चिराग में भी यह कला है और 2014 में राम विलास ने एनडीए में वापसी चिराग की सलाह पर ही की थी। लोक सभा में शून्य पर पहुंच चुकी एलजेपी का कायाकल्प इसके बाद ही होना शुरू हुआ।

लोक सभा चुनावों में 2014 से ऐसे हुआ एलजेपी का कायाकल्प

चुनाव वर्षलड़े गए गठबंधनकुल सीटें लड़ींजीती गई सीटेंकुल मत प्रतिशत टिप्पणी / गठबंधन
2004UPA (कांग्रेस गठबंधन)4041.26%बिहार में 4 सीटें जीतीं।
2009चौथे मोर्चे (RJD-SP)1200.45%खाता नहीं खुल सका।
2014NDA (भाजपा गठबंधन)760.41%7 में से 6 सीटों पर जीत दर्ज की।
2019NDA (भाजपा गठबंधन)660.52%शत-प्रतिशत सफलता (6 में से 6 सीटें)।
2024NDA (LJP-रामविलास)550.44%चिराग पासवान के नेतृत्व में सभी 5 सीटें जीतीं।

चिराग में हवा का रुख भांपने के अलावा 'सौदेबाजी' की भी जबरदस्त कला है। 2020 में केवल एक विधायक की जीत के बावजूद 2025 में उन्होंने एनडीए में बीजेपी से अच्छी सौदेबाजी की और अपनी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के लिए 29 सीटें हासिल कर लीं। इनमें से 19 सीटों पर उनके विधायक जीत गए। कांग्रेस, हम, आरएलएम, भकपा (माले), बीएसपी, माकपा ने मिल कर जितनी सीटें जीतीं, उतनी अकेले लोजपा ने जीत ली। राजद से महज छह सीटें कम।

2025 के बिहार विधान सभा चुनाव से पहले चिराग ने 2024 के लोक सभा चुनाव में भी अपना जलवा दिखा दिया था। उन्हें लड़ने के लिए एनडीए में 5 सीटें मिली थीं। उन्होंने पांचों पर जीत का परचम फहरा कर एनडीए में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। इसकी बदौलत न केवल उन्हें मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद मिला, बल्कि बिहार में भी स्थिति मजबूत हुई और 2025 के विधान सभा चुनाव में लड़ने के लिए अच्छी संख्या में सीटें मिलीं।

बिहार विधान सभा में लोजपा

चुनाव वर्षलड़े गए गठबंधनसीटें लड़ींजीती गई सीटेंमत प्रतिशत (बिहार)मुख्य परिणाम
फरवरी 2005स्वतंत्र1782912.62%पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन; सरकार बनाने में किंगमेकर की भूमिका।
अक्टूबर 2005स्वतंत्र2031011.10%मध्यावधि चुनाव में सीटें घटीं।
2010RJD गठबंधन7536.75%केवल 3 सीटों पर जीत मिली।
2015NDA4224.83%NDA गठबंधन में 2 सीटें जीतीं।
2020स्वतंत्र (अकेले)13515.66%चिराग पासवान के नेतृत्व में 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' के तहत अकेले चुनाव लड़ा।

चिराग लगातार राजनीतिक रूप से परिपक्व होने का परिचय देते रहे हैं। एनडीए में रहते हुए भी उन्होंने अपनी और पार्टी की अलग पहचान बनाए रखने पर अच्छा काम किया है। इसके लिए कई मौकों पर वह बीजेपी की लाइन से थोड़ा अलग राय सार्वजनिक करते भी देखे जाते हैं। हाल में जमुई में एक लड़की के साथ हुई हैवानियत और देश भर में युवाओं के विरोध प्रदर्शन के मुद्दे पर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।

यूपी में भाजपा से हिस्सा मांगेंगे चिराग पासवान?

अपनी अलग पहचान के साथ चिराग पार्टी के विस्तार की योजना पर भी काम कर रहे हैं। अब उनकी नजर उत्तर प्रदेश पर है। यहां कुछ महीने बाद विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। चिराग प्रदेश में सक्रिय हो गए हैं और यह बयान भी देते रहे हैं कि उनकी राज्य की सभी सीटों पर लड़ने की तैयारी है। उनका यह बयान भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। उसे यूपी में एक नए साथी के साथ सीट बांटनी पड़ सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ और चिराग अकेले लड़े तो इसका कुछ नुकसान भाजपा को हो सकता है, क्योंकि चिराग के पास वहां कुछ खोने के लिए नहीं है।

चिराग पासवान समुदाय से हैं, लेकिन वह पिता की तरह इसे पहचान बना कर राजनीति नहीं कर रहे हैं। इसका भी उन्हें फायदा मिल रहा है। वह एक प्रगतिशील सोच वाले युवा की छवि मजबूत करते रहने पर काम कर रहे हैं। लेकिन, दलित नेता की अपनी पहचान खत्म भी नहीं होने दे रहे हैं। न केवल बिहार, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक दलित नेता के रूप में उनकी छवि मजबूत हो रही है। मायावती, जीतन राम मांझी जैसे नेताओं का कद कम होते जाने की स्थिति में चिराग के लिए इस फ्रंट पर खुला आसमान है।

चिराग की राजनीति का एक बड़ा आधार 'बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट' है। बिहार के युवा नेताओं में वह अपनी जगह लगातार मजबूत करने में लगे हैं। संभवतः वह एक दिन राज्य का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी पाले हुए हैं। उनके पिता के पास तो दो बार ऐसे मौके आए थे, पर उन्होंने गंवा दिया था। चिराग के सामने क्या स्थिति होगी और वह क्या करेंगे, यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

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31 Oct 2026, 12:58 PM IST
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