
Junaid Malik Supreme Court: नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रदर्शन में मुकदमों की फेहरिस्त बनना नई बात नहीं है, लेकिन जब भोजन-पानी जैसी मानवीय सेवाएं देने वाले स्वयंसेवक कानूनी दांव-पेच में उलझ जाएं, तो बहस का दायरा बड़ा हो जाता है। सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) से जुड़े प्रदर्शन मामले में कुछ ऐसा ही मोड़ देखने को मिला है, जहां 'फूड वॉलंटियर' के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले जुनैद मलिक ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है।
जुनैद मलिक की ओर से शीर्ष अदालत में अर्जी दाखिल कर पुलिस कार्रवाई और किसी भी तरह की कठोर/दंडात्मक कार्रवाई (Coercive Action) पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाने की मांग की गई है।
याचिका में मुख्य रूप से यह पक्ष रखा गया है:
मानवीय सेवा की भूमिका: जुनैद का कहना है कि प्रदर्शन स्थल पर उनका काम केवल लोगों तक भोजन और बुनियादी मदद पहुंचाना था, न कि किसी हिंसा या गैर-कानूनी गतिविधि को बढ़ावा देना।
पूर्वाग्रह से ग्रसित कार्रवाई का आरोप: पुलिस पर बिना पर्याप्त तथ्यों की जांच किए जल्दबाजी में एफआईआर (FIR) दर्ज करने और निशाना बनाने का आरोप लगाया गया है।
मौलिक अधिकारों का हनन: निष्पक्ष जांच के अभाव में गिरफ्तारी की आशंका से जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार पर खतरा बताया गया है।
यह पूरा विवाद CJP के तत्वावधान में आयोजित उस प्रदर्शन से जुड़ा है, जिसके बाद पुलिस ने विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने के आरोपों के बीच पुलिस ने आयोजकों के साथ-साथ मौके पर मौजूद अन्य लोगों को भी जांच के दायरे में लिया। इसी कड़ी में जुनैद मलिक पर भी शिकंजा कसने लगा, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट के रास्ते से हटकर या राहत न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी।
कानूनी पहलू: आपराधिक कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति की भूमिका किसी अपराध में केवल सहयोगी या सेवा प्रदाता की रही है, तो उसकी आपराधिक मंशा सिद्ध करना पुलिस के लिए कानूनी रूप से जरूरी होता है। जुनैद की विधिक टीम इसी बिंदु को आधार बनाकर अंतरिम संरक्षण की मांग कर रही है।
भारत में नागरिक आंदोलनों या बड़े प्रदर्शनों के दौरान 'फूड वॉलंटियर' और मेडिकल सेवा देने वाले दल हमेशा से अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। चाहे किसान आंदोलन हो या अन्य बड़े सामाजिक प्रदर्शन, भोजन-पानी की व्यवस्था करने वाले वॉलंटियर्स को अक्सर कानूनी जांच की आंच सहनी पड़ी है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि प्रदर्शनकारियों को रसद या खाना पहुंचाने वालों पर इस तरह की पुलिस कार्रवाई से सामाजिक सेवा की भावना हतोत्साहित होती है। वहीं दूसरी ओर, जांच एजेंसियों का तर्क रहता है कि प्रदर्शन के दौरान वित्तीय या रसद सहायता प्रदान करने वालों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि माहौल बिगाड़ने में किसी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग तो नहीं था।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं कि अदालत एक मानवीय सेवा देने वाले कार्यकर्ता की दलीलों और पुलिस की तफ्तीश के बीच संतुलन कैसे बनाती है।