
Salt Farming Challenges: अगली बार जब आप चुटकी भर नमक खाने में छिड़कें, तो याद रखें कि यह सफेद क्रिस्टल अब सिर्फ एक मसाला नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग लड़कर आपकी थाली तक पहुंचा एक 'दुर्लभ रत्न' बनता जा रहा है। नमक खाने की उन दुर्लभ चीजों में से है जिसे खेत में बोया नहीं जाता। यह न तो चावल की तरह पानी में उगता है और न ही आम की तरह पेड़ों पर फलता है।
यह पूरी तरह से सूरज, हवा और मौसम के संतुलन का नतीजा है। जलवायु परिवर्तन ने नमक बनाने के इस सदियों पुराने गणित को बिगाड़ कर रख दिया है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि क्लाइमेट चेंज से गर्मी बढ़ेगी तो वाष्पीकरण तेज होगा और नमक जल्दी बनेगा। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
समुद्री जल से नमक बनाने के लिए खारे पानी को बड़े और उथले गड्ढों (क्यारियों) में इकट्ठा किया जाता है। सूर्य की रोशनी और हवा से पानी वाष्पीकृत हो जाता है और नीचे कच्चा नमक बच जाता है। इस प्रक्रिया के लिए लंबे समय तक सूखा मौसम, तेज धूप और बिना बारिश के दिन चाहिए होते हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नमक उत्पादक देश है, जहां हर साल 3.07 करोड़ टन नमक का उत्पादन होता है। देश के कुल उत्पादन का 85% हिस्सा अकेले गुजरात से आता है।
गेहूं, मक्का या सब्जियों का विकल्प तो जेनेटिक इंजीनियरिंग या पॉलीहाउस से निकाला जा सकता है, लेकिन प्राकृतिक वाष्पीकरण से बनने वाले सफेद सोने यानी नमक का कोई कृत्रिम विकल्प नहीं है। सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसी संस्थाएं अब ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैं, जिससे प्रतिकूल मौसम में भी वाष्पीकरण तेज किया जा सके। लेकिन जब तक ये तकनीक जमीन पर नहीं उतरतीं, तब तक खतरा बरकरार है।