भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार उत्तर भारत के हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी और बारिश में तेज कमी दर्ज की गई है। कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस और घटती बर्फबारी के कारण ग्लेशियर रिचार्ज नहीं हो पा रहा, जिससे नदी जलस्तर प्रभावित और करीब 2 अरब लोगों के लिए पानी का संकट बढ़ रहा है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़े उत्तर भारत के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं। दिसंबर के महीने में उत्तर भारत के लगभग सभी हिस्सों में न तो बारिश हुई और न ही बर्फबारी। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जनवरी से मार्च के बीच उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में औसत से 86% कम बारिश और बर्फबारी होगी। साल 1971 से 2020 के बीच उत्तर भारत का एलपीए (लॉन्ग पीरियड एवरेज) 184.3 मिमी था। IIT जम्मू के शोध के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बर्फबारी में 25% की कमी आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2024-2025 की सर्दियों में बर्फ के टिकने की दर सामान्य से 24% कम रही, जो पिछले 23 वर्षों में सबसे कम है। पिछले पांच में से चार सालों में यह दर सामान्य से नीचे ही रही है।
हिमालय क्षेत्र अब एक 'डबल ट्रबल' का सामना कर रहा है। एक तरफ पुराने ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, तो दूसरी तरफ नई बर्फ उन्हें रिचार्ज करने के लिए पर्याप्त मात्रा में नहीं गिर रही है। इस क्षेत्र की 12 बड़ी नदियों के पानी का लगभग एक-चौथाई हिस्सा बर्फ पिघलने से आता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बर्फबारी की कमी से इस क्षेत्र की नदी घाटियों में रहने वाले करीब 2 अरब लोगों के लिए पानी का संकट पैदा हो सकता है।
हिमालय में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी का मुख्य स्रोत 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस'(पश्चिमी विक्षोभ) है, जो भूमध्य सागर से नमी लेकर आता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में काफी कमजोर हो गए हैं। ये विक्षोभ अब उत्तर की ओर खिसक रहे हैं, जिससे वे अरब सागर से नमी नहीं उठा पा रहे हैं और हिमालय तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देते हैं।