
क्या दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन जोर पकड़ने वाला है? 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है। उस दिन सीजेपी का 'संसद मार्च' का कार्यक्रम है। इससे पहले सोनम वांगचुक के अनशन को मिलने वाला मीडिया कवरेज और नेताओं का समर्थन बढ़ा है। सीजेपी ने सभी पार्टियों और नेताओं से समर्थन की अपील की है। 17 जुलाई को कांग्रेस के पवन खेड़ा भी जंतर मंतर जा कर सोनम वांगचुक से मिल आए। जंतर मंतर पर यह चर्चा भी चलाई जा रही है कि क्या राहुल गांधी भी आएंगे?
शुक्रवार (17 जुलाई) को सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल 20वें दिन भी जारी रही। इससे पहले आम आदमी पार्टी (आप), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), समाजवादी पार्टी (सपा), शिव सेना (उद्धव), सीपीआई, सीपीआई माले, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसी कई विपक्षी पार्टियों के नेता सीजेपी की मुहिम को समर्थन दे चुके और जंतर मंतर जाकर सोनम वांगचुक से मिल भी चुके हैं। कई सेलेब्रिटीज भी वांगचुक के समर्थन में बयान दे रहे हैं और बड़ी भूमिका निभाने की जरूरत बताते हुए उनसे अनशन खत्म करने की अपील कर रहे हैं। ऐसे में 20 जुलाई पर नजर टिकी हुई है और उत्सुकता इस बात को लेकर है कि क्या संसद मार्च में कांग्रेस सहित सभी पार्टियों के नेता सीजेपी और सोनम वांगचुक का साथ देंगे?
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा भले ही जंतर मंतर जाकर सोनम वांगचुक से मिले, लेकिन 20 जुलाई को संसद मार्च में कांग्रेस शामिल होगी या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। सीजेपी का जो मुद्दा है, कांग्रेस उसे अपने स्तर से गंभीरता से उठा रही है। पेपर लीक का विरोध और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कांग्रेस और राहुल गांधी लगातार कर रहे हैं।
राहुल गांधी अलग-अलग शहरों में जाकर छात्रों के बीच यह मुद्दा उठा रहे हैं और प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहरा रहे हैं। 17 जुलाई को भी देहरादून में उनका यह कार्यक्रम चर्चा में रहा। ऐसे में कांग्रेस इस मुद्दे पर सीजेपी की मुहिम में शामिल हो, यह उसे राजनीतिक रूप से फायदे की बात नहीं लगती।
कांग्रेस ने पेपर लीक और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा उठा कर जो मोमेंटम बनाया है, उससे वह खुश है। इस मुहिम का नेतृत्व खुद राहुल गांधी कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी किसी दूसरे शख्स की मुहिम को समर्थन देने की नीति को कभी सही नहीं मान सकती। हां, अगर राहुल गांधी को 'संसद मार्च' का नेतृत्व करने का अवसर मिले, तो यह कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से एक अवसर जरूर बन सकता है। सीजेपी को कांग्रेस या राहुल गांधी को यह अवसर देने में कोई दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए।
कांग्रेस का मानना है कि सीजेपी सोशल मीडिया से पैदा हुई मुहिम है। हवा के एक झोंके की तरह, जो टिकाऊ नहीं होगी। सीजेपी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश मीडिया को बता भी चुके हैं कि इस तरह के अभियान शुरू होते हैं और खत्म भी हो जाते हैं।
जयराम यह कह तो रहे हैं, लेकिन कई कांग्रेसी ऐसे भी हैं जिन्हें इस बात का डर है कि कल को सीजेपी कहीं दूसरी 'आप' न बन जाए। आप का जन्म भी एक आंदोलन से ही तो हुआ। उस आंदोलन का शुरुआती बड़ा चेहरा अन्ना हज़ारे थे। आज सोनम वांगचुक हैं। आप के पैदा होने से कांग्रेस को ही सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। अगर आप वाला इतिहास दोहराया गया तो यह कांग्रेस की राजनीति के लिए ही नुकसानदेह होगा। ऐसे में कांग्रेस भला सीजेपी को समर्थन का जोखिम क्यों ले?
एक बात यह भी है कि अभिजीत दीपके का अरविंद केजरीवाल से पुराना नाता रहा है। जब केजरीवाल आंदोलन कर रहे थे तब दीपके और उनके कुछ साथी उनके लिए काम भी कर चुके हैं।
तमाम जोखिम के बावजूद स्थिति ऐसी भी नहीं है कि कांग्रेस खुद को सीजेपी के अभियान से एकदम अलग रख ले। खास कर तब जब सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल की वजह से आंदोलन चर्चित हो गया हो। यही वजह है कि पवन खेड़ा ने जंतर मंतर पर जाकर वांगचुक से मुलाक़ात की। कांग्रेस की एक रणनीति यह भी हो सकती है कि वह वांगचुक के चलते मुद्दे से करीबी और अभिजीत दीपके से 'सुरक्षित दूरी' बनाए रखने की रणनीति पर चले।
मुहिम में साझीदार नहीं बनने की एक वजह यह भी हो सकती है कि सीजेपी बनाने वाले अभिजीत दीपके कुछ समय पहले तक राहुल गांधी की आलोचना किया करते थे। ऐसे में कांग्रेस नेता उनकी मुहिम से वास्तविक दूरी बना कर चलने में ही भलाई समझ रहे हैं।