
Delhi Riot Conspiracy Case: 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में आरोपी शरजील इमाम ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की है। जमानत याचिका खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। यह मामला गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज किया गया था। अपील पर 17 जुलाई को जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस विकास महाजन की डिवीजन बेंच के सामने सुनवाई होगी।
आरोपी शरजील इमाम ने कड़कड़डूमा कोर्ट के बीते 4 जुलाई के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। अपनी अपील में इमाम ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश के बाद छह महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद, ट्रायल में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने कहा है कि आरोप तय करने (framing of charges) पर बहस अभी पूरी नहीं हुई है और वह लगभग छह साल से हिरासत में हैं।
वकील अहमद इब्राहिम के जरिए दायर अपील में कहा गया है कि ट्रायल में लंबी देरी और लगातार जेल में रहने से हालात बदल गए हैं, जो जमानत देने के लिए सही आधार हैं। इमाम ने सुप्रीम कोर्ट के 22 मई के आदेश का भी हवाला दिया है, जिसमें सह-आरोपी तस्लीम अहमद को अंतरिम जमानत दी गई थी और UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत से जुड़े कानूनी मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजा गया था। याचिका के अनुसार, यह एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है जिस पर उनकी जमानत याचिका पर फैसला करते समय विचार किया जाना चाहिए।
बीते 4 जुलाई को, कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज समीर बाजपेयी ने शरजील इमाम और सह-आरोपी उमर खालिद की रेगुलर जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश से बंधा हुआ है, जिसने उनकी पिछली जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था।
उन्हें अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सुरक्षित गवाहों (protected witnesses) के बयान दर्ज होने के बाद या एक साल बाद जो भी पहले हो फिर से जमानत मांगने की इजाजत दी थी। चूंकि दोनों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने माना कि जमानत याचिकाएं सुनवाई के लायक नहीं थीं।
अभियोजन पक्ष ने याचिकाओं का विरोध करते हुए तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। उन्होंने यह भी बताया कि उमर खालिद की रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी है। यह मामला 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के पीछे की कथित बड़ी साजिश से जुड़ा है।