राष्ट्रीय

NEET पेपर लीक ही नहीं धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का ये भी है कारण! कार्यकाल के दौरान गरमाया था मुद्दा

Education Minister Resigns: धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं, केवल नीट पेपर लीक मामला ही नहीं इस्तीफे के कई और कारण भी थे।
2 min read
Dharmendra Pradhan
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल के सबसे बड़े विवाद (सोर्स: पीटीआई)

Dharmendra Pradhan Controversy: केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनके कार्यकाल की चर्चा शुरू हो गई है। करीब साढ़े 5 साल तक शिक्षा मंत्रालय संभालने वाले प्रधान के सामने कई बड़ी चुनौतियां रहीं। इनमें NEET-UG पेपर लीक, NTA की कार्यप्रणाली, UGC के नियम, NCERT की किताबों में बदलाव और राज्यों के साथ टकराव जैसे मुद्दे शामिल रहे। शिक्षा नीति से लेकर विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों तक कई फैसलों पर सवाल उठे। हालांकि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन…NEET परीक्षा विवाद सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया।

NEET और NTA विवाद ने बढ़ाया दबाव

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में सबसे बड़ा संकट प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर रहा। NEET-UG पेपर लीक मामले ने देशभर में स्टूडेंट्स और पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी। 2024 में NEET परीक्षा में पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स को लेकर विवाद हुआ। कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जांच एजेंसियों को भी कार्रवाई करनी पड़ी।

इसके बाद 2026 में NEET परीक्षा को लेकर फिर विवाद सामने आया। पेपर लीक की आशंका के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी और दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। इस घटना ने छात्रों के भरोसे और परीक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा किया।

इसके अलावा UGC-NET परीक्षा भी विवादों में आई। परीक्षा के एक दिन बाद ही इसे रद्द कर दिया गया। मंत्रालय ने पेपर लीक की जानकारी मिलने के बाद जांच के आदेश दिए। लगातार हो रही गड़बड़ियों के कारण नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) पर भी सवाल उठे। NEET, JEE, CUET और दूसरी बड़ी परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने वाली NTA को तकनीकी खामियों और प्रबंधन की समस्याओं को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी।

NCERT बदलाव और भाषा नीति पर विवाद

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर भी कई बहस हुईं। NCERT की किताबों के रेशनलाइजेशन को लेकर काफी विवाद हुआ। सरकार ने इसे छात्रों पर पढ़ाई का बोझ कम करने की कोशिश बताया। लेकिन विपक्ष और कई इतिहासकारों ने आरोप लगाया कि पाठ्यक्रम में बदलाव के जरिए इतिहास के कुछ हिस्सों को हटाया जा रहा है। कक्षा 12 की इतिहास और राजनीति विज्ञान की किताबों से मुगल इतिहास, गुजरात दंगों और लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने पर सवाल उठे।

वहीं, नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत तीन भाषा वाले फॉर्मूले को लेकर भी विवाद हुआ। खासकर तमिलनाडु जैसे राज्यों ने हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। राज्य सरकारों और केंद्र के बीच इस मुद्दे पर लंबे समय तक मतभेद रहे। हालांकि धर्मेंद्र प्रधान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि नीति का उद्देश्य भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है।

विश्वविद्यालयों और शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी कई फैसले चर्चा में रहे। 2025 में UGC के नए ड्राफ्ट नियमों में वाइस चांसलर नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का प्रस्ताव आया। इन नियमों में वीसी पद के लिए पात्रता बढ़ाने और नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यपाल व विजिटर की भूमिका बढ़ाने की बात कही गई थी। कई विपक्षी राज्यों और शिक्षाविदों ने इसका विरोध किया। ‘PM SHRI’ स्कूल योजना को लेकर भी केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद सामने आए। कुछ राज्यों ने योजना से जुड़ी शर्तों को लेकर आपत्ति जताई।

इसके अलावा CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था भी विवादों में रही। मूल्यांकन में तकनीकी गड़बड़ियों और छात्रों की शिकायतों के बाद इस व्यवस्था पर सवाल उठे। कुल मिलाकर धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल कई बड़े शिक्षा सुधारों और योजनाओं के लिए जाना जाएगा। लेकिन इसी दौरान परीक्षा व्यवस्था, पाठ्यक्रम बदलाव और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर कई विवाद भी सामने आए। यही मुद्दे उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल रहे।