
Karnataka Cabinet Expansion: कर्नाटक की राजनीति में अमूमन हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इस परंपरा को तोड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं। वर्ष 2028 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए डीके शिवकुमार की 33 सदस्यीय कैबिनेट का जो खाका सामने आया है, वह केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि एक सुविचारित चुनावी रणनीति है। इस नए मंत्रिमंडल के जरिए कांग्रेस ने अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने के साथ-साथ राज्य के हर प्रमुख वर्ग और क्षेत्र को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है।
कैबिनेट विस्तार में सबसे बड़ा दांव अनुसूचित जाति (SC) समुदाय पर खेला गया है। मंत्रिमंडल में सात दलित मंत्रियों को शामिल कर कांग्रेस ने 2004 के बाद का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बनाया है। यह संख्या राज्य के प्रभावशाली लिंगायत समुदाय के सात मंत्रियों के बराबर है।
दलित प्रतिनिधित्व में भी अंदरूनी संतुलन का पूरा ध्यान रखा गया है:
एससी (लेफ्ट): के.एच. मुनियप्पा और के.एस. बसवंतप्पा।
एससी (राइट): उप-मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर, प्रियंक खरगे, शिवराज तंगड़ागी, पी.एम. नरेंद्रस्वामी और रुद्रप्पा लमाणी।
दूसरी ओर, लिंगायत समुदाय से एम.बी. पाटिल, ईश्वर खंड्रे, शरणप्रकाश पाटिल, बसवराज रायरेड्डी, विजयानंद कशप्पनवर, लक्ष्मण सावदी और एस.एस. मल्लिकार्जुन को जगह दी गई है।
यह फेरबदल महज पद बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक बिसात बिछाई गई है:
पंचमसाली लिंगायत साधना: लक्ष्मी हेब्बालकर की जगह विजयानंद कशप्पनवर को शामिल कर कांग्रेस ने पंचमसाली लिंगायतों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है, ताकि भाजपा के बागी और कद्दावर नेता बसनगौड़ा पाटिल यतनाल के प्रभाव को बेअसर किया जा सके।
दावणगेरे का किला: कांग्रेस के कद्दावर दिवंगत नेता शमनूर शिवशंकरप्पा के निधन के बाद दावणगेरे क्षेत्र में पकड़ बरकरार रखने के लिए एस.एस. मल्लिकार्जुन को तवज्जो दी गई है।
वोक्कालिगा संतुलन: मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खुद वोक्कालिगा समुदाय से आने के बावजूद, इस वर्ग के छह मंत्रियों को शामिल किया गया है ताकि वर्चस्व का संदेश दिए बिना समुदाय का भरोसा कायम रहे।
| सामाजिक वर्ग | मंत्री संख्या | टिप्पणी |
|---|---|---|
| दलित (SC) | 7 | कैबिनेट में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व (लिंगायत के बराबर) |
| लिंगायत | 7 | दलितों के बराबर प्रतिनिधित्व |
| वोक्कालिगा | 6 | मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार सहित |
| अहिंदा (ST, मुस्लिम, कुरुबा) | 8 | एसटी, मुस्लिम और कुरुबा समुदायों का संयुक्त प्रतिनिधित्व |
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की राजनीति का आधार रहा अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) फार्मूला इस कैबिनेट में भी साफ नजर आता है। सिद्धारमैया के सक्रिय चुनावी राजनीति से पीछे हटने के बाद कांग्रेस इसी सामाजिक गठजोड़ को आगे बढ़ाकर अपना जनाधार बनाए रखना चाहती है।
मंत्रिमंडल में तीन अनुसूचित जनजाति (एसटी) नेताओं सतीश जारकीहोली, बी. नागेंद्र और टी. रघुमूर्ति को जगह दी गई है। वहीं मुस्लिम समुदाय से यूटी खादर, बीजेड जहीर अहमद खान और रिजवान अरशद को मंत्री बनाया गया है। कुरुबा समाज से सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया और बायरथी सुरेश को प्रतिनिधित्व मिला है।
चुनावी दृष्टिकोण से क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए राजधानी और प्रमुख जिलों को विशेष तवज्जो दी गई है। बेंगलोर अर्बन से सर्वाधिक छह मंत्रियों को जगह मिली है। इसके अलावा मांड्या, बेलगावी, कोप्पल और दावणगेरे जिलों से दो-दो मंत्री बनाए गए हैं, जिससे राज्य के उत्तरी, दक्षिणी और मध्य भागों के बीच सत्ता का संतुलन बना रहे।
भाजपा लंबे समय से लिंगायत वोट बैंक को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही है, जबकि कांग्रेस दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों में मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश करती रही है। नई कैबिनेट में दोनों प्रमुख सामाजिक समूहों को बराबर प्रतिनिधित्व देकर कांग्रेस ने यह संकेत दिया है कि वह किसी एक वर्ग पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक सामाजिक गठबंधन के सहारे चुनावी मैदान में उतरना चाहती है।
यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में इस मंत्रिमंडल को केवल सरकार का विस्तार नहीं, बल्कि 2028 विधानसभा चुनाव की शुरुआती चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले महीनों में सरकार का प्रदर्शन और इन सामाजिक समीकरणों का असर ही तय करेगा कि कांग्रेस का यह दांव कितना सफल साबित होता है।