
ED Raid: कोलकाता में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दुर्गा पूजा से जुड़े टिकटिंग मामले में बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने एक साथ 15 ठिकानों पर छापेमारी शुरू की है, जिनमें पश्चिम बंगाल के पूर्व TMC मंत्री इंद्रनील सेन से जुड़े परिसर भी शामिल हैं। जांच कथित तौर पर मास आर्ट्स सोसाइटी के नाम पर जुटाई गई अपराध की कमाई से जुड़ी है।
अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, जांच के दायरे में लोगों का एक ऐसा समूह है जिसने 'मास आर्ट्स सोसाइटी' नाम की संस्था बनाई थी। इस समूह पर गंभीर आरोप है कि इन्होंने जनता के सामने खुद को यूनेस्को (UNESCO) से मान्यता प्राप्त संस्था के रूप में पेश किया। फर्जी दावों के जरिए सोसाइटी ने बड़ा फंड जुटाया और लोगों का भरोसा जीतकर अपनी गतिविधियों को अंजाम दिया।
जांच में यह बात सामने आई है कि संस्था का नाम इस्तेमाल करने वाले लोग दुर्गा पूजा उत्सव से जुड़े बड़े-बड़े आयोजनों का आयोजन कर रहे थे। इन धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रवेश के नाम पर आम लोगों को महंगे टिकट बेचे जा रहे थे। ED का मानना है कि दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार के नाम पर गलत तरीके से करोड़ों रुपये कमाए गए हैं।
फिलहाल ED के अधिकारी कोलकाता स्थित सभी 15 ठिकानों पर कागजातों, डिजिटल साक्ष्यों और बैंक खातों की बारीक जांच कर रहे हैं। पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन के ठिकानों पर भी तलाशी अभियान जारी है।
इस बड़े फर्जीवाड़े की शुरुआत जून महीने में हुई थी, जब कोलकाता के बहुबाजार थाने में पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन, उनकी पत्नी मधुछंदा सेन और मास आर्ट संस्था के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज कराई गई थी। पुलिस जांच के आधार पर अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शिकंजा कस दिया है। जांच एजेंसी मुख्य रूप से यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी पास बेचकर जो करोड़ों रुपये जुटाए गए, वे किन-किन बैंक खातों में भेजे गए। इसके साथ ही ED इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि इस पूरे खेल में और कौन-कौन से बड़े और रसूखदार चेहरे शामिल हैं।
मामले में बड़ा खुलासा यह भी हुआ है कि दुर्गा पूजा के नाम पर आम लोगों को बिना भीड़ के पूजा देखने (प्रिव्यू शो) का लालच देकर VIP पास बेचे गए। इन पासों की कीमत 1,749 रुपये से लेकर 5,499 रुपये तक रखी गई थी। सरकारी आंकड़ों की मानें तो साल 2022 से 2024 के बीच करीब 1.14 लाख लोगों ने इस झांसे में आकर रजिस्ट्रेशन कराया। अनुमान है कि श्रद्धा और त्योहार के नाम पर लगभग 50 से 60 करोड़ रुपये का काला धन जुटाया गया, जिसे निजी फायदों के लिए इस्तेमाल किया गया।