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सुनेत्रा पर सवाल उठाने वाले खुद हैं अनजान! क्या आपको पता है राजीव गांधी ने कब ली थी PM पद की शपथ ?

Sunetra Pawar: पति का निधन होते ही सुनेत्रा के शपथ लेने पर सवाल उठाने वाले लोग खुद इतिहास के आधे सच से वाकिफ हैं। जानिए राजीव गांधी की शपथ ग्रहण की वो सच्चाई, जिसने सोशल मीडिया ट्रोल्स की बोलती बंद कर दी है।

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Feb 02, 2026
सुनेत्रा पवार (वर्तमान) और राजीव गांधी( अतीत) शपथ ग्रहण। फोटो: AI Generated)

Prime Minister: अजित पवार का निधन होते ही सुनेत्रा पवार के शपथ लेने पर सोशल मीडिया पर उन्हें जम कर ट्रोल किया गया। इस शोर-शराबे के बीच एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है-क्या सुनेत्रा (Sunetra Pawar Viral Video) पर हंसने वाले 'कीबोर्ड वॉरियर्स' खुद इतिहास का पूरा सच जानते हैं? राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने (Rajiv Gandhi Oath Date) की तारीख के बारे में कई लोगों को जानकारी नहीं है। सच्चाई यह है कि राजीव गांधी के शपथ ग्रहण का मामला उतना सीधा नहीं है, जितना सोशल मीडिया के मीम (Memes) बनाने वाले समझते हैं। इतिहास के पन्ने पलटें तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है।

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अधूरे ज्ञान पर हंगामा क्यों ? (1984 General Elections)

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और कमेंट्स में दावा किया जा रहा है कि सुनेत्रा पवार ने गलत तारीख या साल बताया। लेकिन इतिहास गवाह है कि राजीव गांधी ने महज एक बार नहीं, बल्कि दो बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। अक्सर आम लोग और यहां तक कि पढ़े-लिखे लोग भी इन दो तारीखों में कन्फ्यूज हो जाते हैं। ट्रोलर्स इसी कन्फ्यूजन का फायदा उठा कर माहौल बना रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि तकनीकी रूप से जवाब देने में कई बार बड़े-बड़े दिग्गज भी चूक कर जाते हैं।

क्या कहता है इतिहास: 31 अक्टूबर या 31 दिसंबर? (Congress History 1984)

सुनेत्रा पवार का बचाव करने से पहले हमें तथ्यों को जानना होगा, जो अक्सर ट्रोल्स को नहीं पता होते:

पहली शपथ (31 अक्टूबर 1984): तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद, उसी दिन शाम को राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उस वक्त कोई चुनाव नहीं हुआ था, यह एक आपातकालीन नियुक्ति थी।

दूसरी शपथ (31 दिसंबर 1984): इसके बाद देश में लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस को ऐतिहासिक बहुमत मिला। चुनाव जीतने के बाद, राजीव गांधी ने 31 दिसंबर 1984 को बाकायदा निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

अब अगर कोई सवाल पूछता है कि "राजीव गांधी पीएम कब बने?", तो संदर्भ के हिसाब से दोनों जवाब सही हो सकते हैं। सोशल मीडिया की भीड़ अक्सर संदर्भ को नजरअंदाज कर सिर्फ मजाक उड़ाने पर ध्यान देती है।

राजनीति में 'क्विज प्रतियोगिता' का दौर

यह पहली बार नहीं है जब किसी नेता को ऐतिहासिक तथ्यों पर घेरा गया हो। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि नेताओं का काम 'इतिहास का प्रोफेसर' होना नहीं, बल्कि नीति निर्माण (Policy Making) है। सुनेत्रा के मामले में भी, विरोधियों ने इसे एक सियासी हथियार बना लिया है। यह एक सुनियोजित 'नैरेटिव' सेट करने की कोशिश लगती है, ताकि उनकी प्रशासनिक क्षमताओं के बजाय उनके सामान्य ज्ञान पर बहस छिड़ी रहे।

"पहले खुद पढ़ें, फिर बोलें"

इस विवाद पर सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया है

समर्थकों का तर्क: सुनेत्रा के समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि "विपक्षी जानबूझकर छोटी भूल को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। जो लोग ट्रोल कर रहे हैं, उनमें से 90% को खुद नहीं पता होगा कि 1984 में असल में क्या हुआ था।"

इतिहासकारों की राय: कुछ राजनीतिक जानकारों ने सोशल मीडिया पर लिखा है, "इतिहास गूगल सर्च से नहीं, किताबों से पढ़ा जाता है। राजीव गांधी का शपथ ग्रहण दो अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ था, इस बारीकी को समझना जरूरी है।"

क्या होगा इसका असर?

इमेज वॉर: आने वाले दिनों में पीआर (PR) टीमें इस मुद्दे को काउंटर करने के लिए 'तथ्यात्मक वीडियो' जारी कर सकती हैं, जिसमें ट्रोल्स की पोल खोली जाएगी।

विपक्ष का हमला: विरोधी खेमा इसे चुनावी रैलियों में भुनाने की कोशिश करेगा और इसे "अज्ञानता" का नाम देकर प्रचारित करेगा।

जनता का मूड: यह देखना दिलचस्प होगा कि वोटर इसे एक मानवीय भूल (Human Error) मानता है या इसे नेतृत्व की कमी के तौर पर देखता है। अक्सर ऐसे मुद्दे कुछ दिन बाद ठंडे पड़ जाते हैं।

24 घंटे की निगरानी का दबाव

इस पूरी घटना का एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू भी है।

कैमरे की कैद में नेता: आज के डिजिटल युग में राजनेता 24 घंटे कैमरे की नजर में रहते हैं। एक छोटी सी जुबान फिसलना (Slip of tongue) या तारीख भूलना राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है।

ट्रोलिंग का कल्चर: यह घटना यह भी दिखाती है कि हमारा समाज कितना असहिष्णु (Intolerant) हो गया है। हम किसी की बात का मर्म समझने के बजाय, उसकी व्याकरण या तथ्यों की एक गलती पकड़कर उसे नीचा दिखाने में ज्यादा रुचि रखते हैं। यह 'गोटचा जर्नलिज्म' (Gotcha Journalism) और सोशल मीडिया ट्रायल का एक क्लासिक उदाहरण है।

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