कर्नाटक विधानसभा में राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सरकार द्वारा भेजे गए अभिभाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार की आलोचना थी। उन्होंने केवल तीन वाक्य बोले और सदन से चले गए।
तमिलनाडु और केरल के बाद गैर-भाजपा शासित राज्य कर्नाटक में भी विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर विवाद हो गया।
राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानमंडल के संयुक्त सत्र की शुरुआत में राज्य सरकार की ओर से भेजा गया वह भाषण नहीं पढ़ा जिसमें केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी।
राज्यपाल ने अभिभाषण के तौर पर तीन वाक्य बोले और सदन से चले गए। सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने इसका जोरदार विरोध किया और नारे लगाए। कुछ ने राज्यपाल का रास्ता रोकने की कोशिश भी की, जिसे सुरक्षा कर्मियों ने विफल कर दिया।
मुख्यमंत्री एन सिद्धारमैया ने आरोप लगाया कि राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार अभिभाषण के बजाय अपना भाषण पढ़ा और संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया।
यह संविधान का उल्लंघन है और सरकार इस पर सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 176 और 163 के अनुसार राज्यपाल को मंत्रिमंडल द्वारा तैयार भाषण पढ़ना होता है।
सूत्रों के अनुसार सरकार व लोकभवन के बीच विवाद का कारण अभिभाषण के शुरुआती दस पैराग्राफ थे, जिनमें केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला किया गया था।
इनमें कर हस्तांतरण, केंद्र प्रायोजित योजनाओं और मनरेगा हटाए जाने पर आलोचना शामिल थी। विवादित 11वें पैराग्राफ में वीबी-जी-राम-जी अधिनियम को निरस्त करने और मनरेगा बहाल करने की मांग की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल इन हिस्सों को हटवाना चाहते थे, लेकिन सरकार सहमत नहीं हुई। गतिरोध के चलते राज्यपाल ने केवल तीन पंक्तियां पढ़ीं और लौट गए।